क्या यूपी में सपा, वाक़ई में है मुसलमानों की ख़ैरख़्वाह

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी क्या मुसलमानों का अपेक्षित वोट हासिल कर पाएगी ?

क्या यूपी में सपा, वाक़ई में है मुसलमानों की ख़ैरख़्वाह

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में फतह हासिल करने के लिए सियासी दल ऐडी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं। हर कोई जाति-धर्म का नाम लेकर चुनावी दांव खेल रहा है । ऐसे में इस बार भी मुसलमान किसके साथ जाएगा,इसका अंदाज़ा लगाना फिलहाल तो मुश्किल है लेकिन राजनीति में कयासों की गुजाइंश हमेशा बनी रहती है।

जहां तक मुसलमानों का सवाल है यूपी में 19 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के अंदर अपनी बेहतरी को लेकर हमेशा शंका बनी रही है । ख़ासकर सियासी पार्टियों की तरफ से मुसलमानों के सच्चे हितैषी बनने की होड़ ने मुसलमान को असमंजस में डाला हुआ है ।

2013 में हुए मुज़फ्फरनगर दंगा पीडितों को आज तक सपा सरकार पुनर्वासित नहीं कर पाई है।राष्टीय मानव अधिकार कमीशन  और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कमीशन  की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सांप्रदायिक दंगे को हुए तीन साल हो चुके है लेकिन अभी तक पूरी तरह से सपा सरकार पीड़ितों को मदद और मरहम लगाने में विफल ही रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जो पीड़ित श्यामली पुनर्वास में रह रहे हैं । वे बड़ी विषम हालात में जीवन बसर कर रहे हैं।

सोमवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की दो सदस्यीय टीम ने 2013 मुज़फ्फरनगर दंगों को लेकर राज्य और केन्द्र की आलोचना करते हुए कहा कि दोनों ही सरकारों ने दंगा पीड़ितों की बेहतरी के लिए अपेक्षित कार्रवाई आज तक नहीं की । आज भी बड़ी दयनीय हालात में ये लोग जीवन गुज़ार रहे हैं । यहां तक कि यहां तक कि 10 में से 8 लोगों को चिकनगुनिया, डेंगू जैसे ख़तरनाक बीमारी ने जकड़ा हुआ है। दंगा पीड़ितों के पास फिलहाल ईंधन के नाम पर मिट्टी का तेल तक नहीं है जिससे वह खाना बना सकें।

मुज़फ्फरनगर और शामली दौरे पर अपनी टीम के साथ पहुंची राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य फरीदा अब्दुल्ला ख़ान ने 'द हिंदू 'अख़बार से कहा कि  वहां धरातल पर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया जिसका दावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने किया है ।

दरअस्ल रिपोर्ट में यह कहा गया कि ज़्यादातर दंगा पीड़ितों ने कैराना जाकर बस गए हैं । जिसे अल्पसंख्यक आयोग ने ग़लत बताया ।

फरीदा अब्दुल्ला ख़ान के मुताबिक़ "एनएचआरसी की रिपोर्ट का दावा था कि क़रीब 30,000 दंगा पीड़ित कैराना क़स्बे में जाकर बस गए हैं और उन्होंने अपनी जगह बदल दी है । तथ्य यह है कि इनमें से ज़्यादातर की संख्या जो हिंदू बहुल इलाक़ों में रहती थी वो दंगे के दौरान कैराना विस्थापित हो गए और इनकी संख्या क़रीब 2000-3000 के बीच थी ।"

ज़्यादा जानकारी के लिए क्लिक करिये यह लिंक... http://www.thehindu.com/news/national/minorities-panel-challenges-nhrc-report-on-kairana/article9231516.ece

हाल ही में निजी अख़बार को दिए गए इंटरव्यू के दौरान  आज़म खान ने कहा भी कि जो सपा मुसलमानों के लिए सबसे बेहतर और सुरक्षित पार्टी है ।

आज़म ख़ान ने जब यह सवाल किया गया कि आख़िर क्यों यूपी में मुसलमान सपा के साथ जाना चाहेगें जहां पर मुज़फ्फरनगर जैसे दंगे और दादरी जैसी घटना सपा के ही शासन काल में घटित हुई है। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि इन तमाम दबाव के बावजूद आज भी उन्हें पूरा विश्वास है कि उनकी सपा, मुसलमानो के बीच ज्यादा लोकप्रिय है।

आजम खान मानते हैं कि सपा के नेतृत्व में मुसलमान को कोई डर नहीं है। क्योंकि सपा सरकार ने मुस्लिम बहुल इलाकों में सड़क, स्कूल, ब्रिज निर्माण जैसे विकास के कई काम करवाए, यहीं नही मदरसाओं में राशि का भुगतान समय पर होता रहा है और साथ में मदरसाओं के छात्रों को छात्रवृति भी राज्य सरकार भुगतान कर रही है।

वहीं दादरी में भीड़ ने अख़लाक़ की हत्या के बाद कुछ लोगों गिरफ्तार भी किया गया । लेकिन इस घटना पर राजनीति अभी तक जमकर हो रही है । सो इसी महीने अखलाक़ के दोषी की मृत्यु हो जाती है जेल में उसके बाद सपा सरकार ने दोषी के परिजनों को 25 लाख रूपये देने का वादा भी किया है।  

सियासत की यह मौक़ापरस्त तस्वीर दर्शाने के लिए काफी है कि जहां पर सपा मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ितों को एक बार फिर बसाने में असफल रही वहीं दूसरी तरफ अखलाक़ के हत्यारे की मौत पर भी सियासत करने से नहीं चूक रही है। क्या मुसलमान समाजवादी पार्टी के लिए महज़ एक वोट बैंक है। समझना मुश्किल नहीं है कि सपा और आज़म खान किस मुंह से मुस्लिम का ख़ैैरख़्वाह बनने का दावा कर रहे हैं।

(फोटो साभार- गूगल)