पितृसत्ता का दंश झेल रही भारतीय महिला को 'यूनीफॉर्म सिविल कोड' क्या देगा राहत ?

सवाल है कि सामाजिक-आर्थिक तौर पर कहीं ना कहीं पिछड़ी भारतीय महिला को आगे लाने में 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' कितना मदद दे सकता है।

पितृसत्ता का दंश झेल रही भारतीय महिला को

भाजपा यूपी चुनाव से पहले क्यों इतनी उत्सुक हो रही है, यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए। दरअस्ल एक बार फिर से यह विवाद खड़ा हो गया कि क्या महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए इस कानून को पारित कर देना चाहिए ? क्या एक कानून उन हजारों धार्मिक अाधारित समस्या का समाधान हो सकता है?

भाजपा जिस तरह से लोगों को बरगला कर इस कानून को जबरन लागू करना चाहती है। उसके पक्ष में कोई भी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन नहीं है। भाजपा इसे साम्प्रदायिक मामला दिखा कर लोगों के मन में भ्रम पैदा कर रही है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड यानि यूसीसी का कोई लेना देना नहीं है महिला सशक्तिकरण या लैंगिक न्याय से क्योंकि हमारा समाज एक पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला समाज है जहां पर महिलाओं को एक बच्चा पैदा करने की मशीन और घरों में काम करने वाली मजदूर के से समान समझा जाता है।

तीन तलाक का हवाला देकर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं उन मुसलमान बहनों की चिंता करता हूं जब उनका पति उन्हें फोन पर ही तलाक दे देता है और दूसरी शादी कर लेता है।

मोदीजी को शायद यह नहीं पता होगा कि केवल मुस्लिम ही अपनी पत्नी को तलाक देकर दूसरी शादी नहीं करता है बल्कि इसमें हिन्दुओं को भी महारथ हासिल है।

क्या मोदी ये जानते हैं कि तीन तलाक धर्म के कानून और रवायतों पर एक प्रश्न चिन्ह लगाता है। हमारें पितृसत्तात्मक समाज हमेशा से महिलाओं को प्रताड़ित करता आया है। भारत में महिलाओं को सबसे ज्यादा उत्पीड़ित धर्म के नाम पर किया जाता रहा है, चाहे शादी हो, परंपरा हो चाहे तलाक़ ही क्यों न हो । हर धर्म चाहे वो हिन्दू, मुसलिम, या ईसाई हो, सब महिलाओं को अपना बपौती समझते हैं। इसलिए भारतीय महिलाओं के साथ लैंगिक असमानता और लैंगिक भेदभाव होता रहा है।

इस्लाम धर्म में क़ुरान कहती है कि तीन तलाक जायज़ है। लेकिन ये तीन तलाक़ एक ही समय में नहीं दिए जा सकते बल्कि तीन महीने में दिए जा सकते हैं। वहीं इस्लाम के ठेकेदारों द्वारा ये बखान किया जा रहा है कि शरीयत कानून ही महिलाओं को न्याय दिलाता है।

दरअसल शरीयत कानून के मुताबिक तलाक देने के बाद पति अपने पत्नी को हर्जाना देता है जिससे पत्नी अपना जीवन निर्वाह कर सके, यही नहीं शादी के समय मुस्लिम लड़का अपनी होने वाली पत्नी 'मैहर' के नाम पर कुछ पैसा देता है जो कि अनिवार्य है उस मुस्लिम लडके के लिए ।

इस रक़म का मुस्लिम औरतें अपने जीवन को चलाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। अगर पति यह रक़म नहीं देता है तो उस पर 1986 प्रोटेक्श्न आॅन राईटस और डिवोर्स एक्ट के तहत कार्यवाही किए जाने का प्रावधान है। वहीं यही शरीयत कानून हर महिला पर लागू नहीं हो रहा ।

जनवरी 1973 में केरल का एक मामला उदाहरण के तौर पर सामने है। दरअस्ल यहां एक हिंदू युवती चेलम्मा ने उमर नाम के एक मुस्लिम लड़के से शादी की लेकिन शादी के बाद युवती ने इस्लाम क़ुबूल नहीं किया ।उमर एक सरकारी मुलाज़िम था और उसकी 1976 में मौत हो गई । मरने से पहले उमर ने चेलम्मा के नाम प्रॉविडेंट फंड में उसको नॉमिनी बनाया। लेकिन जब विधवा चेलम्मा ने नॉमिनी के तौर पर प्रमाणपत्र पाने के लिए आवेदन दिया तो उसको चुनौती के लिए उमर के परिवार वाले सामने आ गए और उन्होंने भी उस पीएफ की रक़म को हड़पने के लिए आवेदन भर दिया । मामला अदालत की दहलीज़ पर पहुंचने के बाद ट्रायल कोर्ट ने मात्र एक तिहाई रक़म चेलम्मा को देने का आदेश सुनाया।इसके पीछे वजह उसका इस्लाम धर्म कुबूल ना करना बताया गया जो शरीयत के मुताबिक़ ग़ैरक़ानूनी विवाह है।  

अब सवाल यह है कि क्या कुछ पैसा भर दे देने से जिन्दगी चलाई जा सकती है ? तो फिर कितनी रक़म से एक महिला अपना जीवन गुज़र बसर कर लेगी? इसका अंदाजा न तो समाज ने लगाया और न ही समाज में फैली पितृसत्तात्मक सोच ने।

यूसीसी का इतिहास देखा जाए तो पता चलता है कि जितने भी धार्मिक निजी कानून हैं। उन कानून को अंग्रजो द्वारा पारित किया गया था। और उस समय के मौलवी और पंडितों को ये काम दिया गया था कि अपना-अपना निजी कानून बताएं और उसको लागू करें। जल्दबाजी में धर्म के पूजारियों ने अपनी मनगढ़ंत बात को कानून की शक़्ल दे डाली क्योंकि यही तो धर्म के पुजारियों का काम रहा है। जिसमें वो अपना नफ़ा देखते हैं उसी को क़ानून बना डालते हैं।

दरअसल भाजपा जिस कानून की बात कर रही है। वह कानून नहीं है । वह भारत के मुसलमानों को दबाने का एक नया हथकंडा है।

क्योंकि भारत देश के संविधान का 44 एक्ट जो यूनीफॉर्म सिविल कोड की बात कर रहा है, के अनुसार " भारतीय सविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है और इस देश के हर समुदाय के लोगो को अपनी जीवन शैली को जीने का अधिकार है। और इस कानून को 371ए और 371जी के तहत पूर्वोत्तर के लोगो और अनसूचित जाति के लोगों पर लागू नहीं हो सकता है। तो फिर ये सामान्य कानून कैसे हो सकता है।

और इसी बात को बाबा अम्बेडकर ने भी कहा था कि यह कानून अनिवार्य नही है। स्पेशल मैरेज एक्ट 1954 के तहत कोई भी पुरूष और महिला अपनी मर्जी से शादी कर सकते हैं और अपनी निजी जिंदगी गुजर- बसर कर सकते हैं।

जिस तरह से हिन्दू राष्ट्रवादी यूसीसी का बख़ान रच रहे हैं। उनका मक़सद महिला को सम्मान देना या महिला को मज़बूत करने या महिलाओं को न्याय दिलाना नहीं है। बल्कि मुसलमानों को यूसीसी जैसे हथकंडे से दबाने की कोशिश है।

तलाक या लैंगिक समानता, किसी कानून को लाकर नहीं बदली जा सकती क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज ही उस कानून को लागू करेगा। हम महिलाओं का सम्मान और महिलाओं को न्याय तब ही दिला सकते हैं जब हमारे अंदर भाव हो।

वैसे तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण जो देना चाहिए था वह बिल अभी तक पास नहीं हो सका है और पता नही होगा भी या नहीं। पर हम कुछ बदलाव कर सकते हैं। ख़ासकर इस मसले को हल करने के लिए।

स्कूलों और काॅलेजों में जेन्डर स्टडीज़ विषय को पढ़ाना, महिला न्याय के बारे में छात्र- छात्राओं को जानकारी देना और उन धार्मिक कानून को बदलना जो सदियों से महिलाओं पर रोक लगाने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। सरकारी नौकरियों में महिला को विशेष छूट देना होगा नही तो हम उस समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते जहां पर महिलाओं का सम्मान होता हो।

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