याद आए अबरार, जानिए- उनके बारे में दिलचस्प बातें

अबरार अली जिन्हें गुरुदत्त की फिल्म साहब बीबी और गुलाम के लिए 1962 में बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था...

याद आए अबरार, जानिए- उनके बारे में दिलचस्प बातें

आज मशहूर लेखक,डायरेक्टरऔर एक्टर अबरार अल्वी की  पुण्यतिथि है.2009 को आज के ही दिन यानि 18 नवंबर को  82 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था। जी हां,वहीं अबरार अली जिन्हें गुरुदत्त की फिल्म साहब बीबी और गुलाम के लिए 1962 में बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था

शायद हीं कोई ऐसा हिंदी सिनेमा प्रेमी होगा जो गुरुदत्त के जादू  से अछूता रह जाए। गुरुदत्त का दिवाना कौन नही है..और फिल्मी दुनिया के  इस शंहशाह ने अपने दरबार में एक से एक नगीने  जड़ रखे थे जिनमें   राज खोसला, वीके मूर्ति, वहीदा रहमान, जॉनी वॉकर, रहमान, गीता दत्त, वही उन पर फिल्माए गानों के लिए उनकी आवाज़ बने मोहम्मद रफ़ी,और हेमंत कुमार,तो  ओपी नैयर, एसडीबर्मन, ने संगीत रचे और  देवा नंद और गुरु दत्त तो एक दुसरे के लिए कमिटेड तो थे हीं.. लेकिन सबसे करीबी कोई था तो वो थे अबरार अल्वी ....

अबरार अल्वी ने 50 की दशक में गुरदत्त के साथ काम करना शुरु किया और ये सिलसिला 1960 तक चला....अबरार के जीवन का ये गोल्डन पिरियड माना जा सकता है....अबरार अल्वी जैसे हीरे की परख गुरुदत्त जैसा कोई जौहरी ही कर सकता था...लिहाजा अबरार जब उनकी टीम के साथ फिल्म जाल के लिए काम कर रहे थे उस वक्त गुरुदत्त एक दृश्य को फिल्माने के लिए बड़ी उलझन में थे कि आखिरकार किस तरह के  डॉयलॉग यहां पर फिट किए जाएं...और तभी अबरार अल्वी जी ने अपने सुझाव गुरुदत्त जी के सामने रखे जो कि गुरुदत्त को बेहद पसंद आए....और इसके बाद उन्होंने फौरन अबरार अल्वी को अपनी अगली फिल्म आरपार के डॉयलॉग लिखने का प्रपोसल दे दिया।

अब गुरदत् अपने भाई आत्मा राम के बाद अबरार अल्वी पर ही सबसे ज्यादा भरोसा रखते थे। और अबरार ने उनके भरोसे को अंत तक कायम रखा। गुरुदत् की फिल्म कागज के फूल बुरी तरह से फ्लॉप हो गई तो गुरुदत्त इतने टूट चुके थे कि उन पर खुद से भी भरोसा टूट चुका था लेकिन उस दौर मे भी उन्हे खुद पर तो नही लेकिन अबरार पर भरोसा था....और उन्हे पूरा याकिन था फिल्मी आकाश गुरुदत् के मिटते सितारे को फिर से अगर कोई रौशन कर सकता है तो वो सिर्फ अबरार अल्वी ही है। और उन्होंने अपनी अगली फिल्म की बागडोर अबरार को हाथों सौंप दी...अबरार ने भी उनके भरोसा को सच करने के लिए खुद को इस फिल्म में झोंक दिया.....और इसका नतीजा फिल्मी दुनिया के इतिहास सुनहरा अक्शर साबित हुई...किसी फिल्म मेकर को अमर बनाने के लिए साहब बीबी और गुलाम जैसी सिर्फ एक ही फिल्म काफी है.... अपनी इस क्लासिक फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला। फिल्म को राष्ट्रपति का रजत सम्मान तो मिला ही, 1963 में बर्लिन फिल्म समारोह में स्क्रीनिंग और ऑस्कर  के लिए भी चुना गया।

चूँकि फिल्म गुरु दत्त फिल्म्स के बैनर पर बनी थी, विवाद उठा कि कहीं  इस फिल्म का निर्देशन  गुरुदत्त ने तो नहीं किया था, हालाँकि गुरुदत्त ने कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया, पर अबरार ने खुद एक बार ये स्वीकार किया कि फिल्म के सभी गाने गुरुदत्त ने फिल्माए थे। इसके अलावा बतौर एक्टर अबरार ने दो फिल्मों में काम किया ये फिल्में थीं 12 O'Clock जो 1958 में बनी थी जिसमें वो एक पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में नजर आए वही दूसरी बार वो 1976 की सुपर हिट फिल्म लैला मंजनू गेस्ट एपिरिएंस में नजर आए।

अबरार ने गुरुदत्त से अलग भी कई हिट फिल्मों के लिए लिखा जिनमें  संघर्ष, सूरज, छोटी सी मुलाकात, मनोरंजन, शिकार और साथी,जैसी सफलतम फिल्में शामिल हैं....लेकिन अबरार अल्वी की असली पहचान तो गुरुदत्त बैनर से ही मानी जाती है....अबरार अल्वी गुरुदत् और उनकी क्लासिक फिल्में , प्यासा, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद और साहिब बीबी और गुलाम बस यही मानों एक दुसरे पूरक जैसे हों.हालांकि शाहरुख़ खान की  फिल्म "गुडडू"  उनकी अंतिम फिल्म रही...जो उतनी सफल नही रही...

सच तो ये है कि अबरार अल्वी जैसा महान फिल्म मेकर साहब बीवी और गुलाम जैसी सुपर क्लासिक फिल्म देने के बाद किसी और हिट फिल्म या अवॉर्ड का मोहताज नही रह जाता.उनकी पुणयतिथि के मौके पर उन्हे हर हिंदी फिल्मों को चाहने वालों की तरफ से शत-शत नमन

मालिनी श्रीवास्तव