...लेकिन हमारे पास दिल है, खुशियां हैं और हम उसे बेचता नहीं है

प्रेमनाथ का नाम लेते ही जेहन में एक रोबीला चेहरा घूमने लगता है....वैसे तो वो अपने खलनायकी अंदाज को लेकर लोकप्रिय रहे लेकिन 1974 में आई राजकपूर की फिल्म 'बॉबी के मछुआरे' में मिस्टर ब्रेंगेजा के किरदार को भी शायद कोई भूल ना पाएगा..

...लेकिन हमारे पास दिल है, खुशियां हैं और हम उसे बेचता नहीं है

मालिनी श्रीवास्तव

प्रेमनाथ का नाम लेते ही जेहन में एक रोबीला चेहरा घूमने लगता है....वैसे तो वो अपने खलनायकी अंदाज को लेकर लोकप्रिय रहे लेकिन 1974 में आई राजकपूर की फिल्म 'बॉबी के मछुआरे' में मिस्टर ब्रेंगेजा के किरदार को भी शायद कोई भूल ना पाएगा..

‘तुम क्या सोचता है पैसा सिर्फ तुम्हारे पास है, तुम्हारे पास बंगला है गाड़ी है, लेकिन हमारे पास दिल है, खुशियां हैं और हम उसे बेचता नहीं है’ अपनी इस अंदाज से प्रेमनाथ ने फैंस के दिलों में एक अमिट छाप छो़ड़ दी...जो आज भी अमर है...

21 नवंबर 1926 को पेशावर में जन्म हुआ था प्रेमनाथ का..बाद में बंटवारे के समय वो अपने परिवार के साथ मध्यप्रदेश के जबलपुर आ गए. एक्टिग का शौक था लिहाज़ा प्रेमनाथ अपनी किस्मत आजमाने  मुंबई आ गए. वहां वो सबसे पहले पृथ्वी थियेटर में शामिल हो गए.

1948 में उनकी पहली फिल्म अजीत आई जो पहली हिंदुस्तानी रंगीन फिल्मों में से एक मानी जाती है...फिल्म तो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही...लेकिन प्रेमनाथ को उतनी पहचान नहीं मिल पाई जिसकी उनको जरुरत थी...वो फिल्मों के दूसरे नायकों की तरह हिरोइन के साथ पेड़ के इर्द-गिर्द घूम कर अपनी रोमांटिक इमेज बनाकर नहीं रह जाना चाहते थे. उसी वक्त आजादी के वक्त की बात है राज कपूर को अपनी फिल्म आग के लिए एक नये चेहरे की तलाश थी...तो पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें राजकपूर से मिलने की सलाह दी और इस तरह राज कपूर के साथ ने प्रेमनाथ को एक नयी पहचान दिलाई.

फिल्म आग से तो नहीं लेकिन राज कपूर की अगली फिल्म बरसात से प्रेमनाथ को सिल्वर स्क्रीन पर एक नई पहचान मिली.

लगभग तीन दशक में प्रेमनाथ ने लगभग सौ से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया. हर फिल्म में वो एक नये अंदाज़ में नजर आए. हर फिल्म में वो एक नई पहचान छो़ड़ते. वो अपने ड्रेस सेंस पर भी बहुत ध्यान देते थे. उनका यही नयापन दर्शकों के बीच उनके इमेज को तरोताज़ा बनाए रखता था. 50 की दशक आते-आते प्रेमनाथ मशहूर हो चुके थे. 1953 में एक फिल्म आई औरत जिसमें मशहूर अदाकारा बीना राय ने बतौर हिरोइन काम किया था. इसी दौरान दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे और शादी के बंधन में बंध गए.

इसके बाद उन्होंने बीना राय के साथ मिलकर फिल निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और पी.एन.फिल्म्स बैनर की स्थापना की और  इस बैनर तले उन्होंने शगूफा, प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा, समुंदर और वतन जैसी फिल्मों का निर्माण किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स आफिस पर चली नहीं. जाहिर है उन्हें जबर्दस्त आर्थिक नुकसान पहुंचा होगा. इसके बाद दोबारा प्रेमनाथ ने फिल्म निर्माण की दुनिया में कदम नहीं रखा और अपना ध्यान अभिनय की ओर लगाना शुरू कर दिया.

इस बीच प्रेमनाथ ने अंजान (1956 ), समुंदर (1957), जागीर (1959), पठान (1962), रूस्तम सोहराब (1963) और सिकंदरे आजम (1965) जैसी फिल्मों में सफल अभिनय किया और उनकी फिल्में बॉक्स-ऑफिस पर सफल भी हुई. लेकिन अपने इस फिल्मी सफर के दौरान प्रेमनाथ इतना समझ गए थे कि फिल्म इंडस्ट्री उन्हें अगर लंबी पारी खेलनी है तो उन्हें नायक नहीं बल्कि खलनायक बनना होगा.

इसके बाद प्रेम नाथ बन गए हिंदी सिने जगत के खलनायक नंबर-वन. 1966 की सुपर हिट रही फिल्म 'तीसरी मंजिल' के मासूम चेहरे वाले जमींदार को लोग आज भी नहीं भूले उनकी मासूमियत की वजह से दर्शक फिल्म के आखिर तक अंदाज नहीं लगा पाते कि असल कातिल कौन है, जॉनी मेरा नाम (1970) ,धर्मात्मा (1975), विश्वनाथ (1978) और कर्ज (1980) यानि एक के बाद एक सुपरहिट फिल्मों का तांता सा बंध गया. वो शम्मी कपूर, देवानंद, फीरोज खान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे उस जमाने के सुपर हिट नायकों के सामने भी अपनी एक्टिंग को लोहा मनवाने में ना सिर्फ कामयाब रहे बल्कि खलनायक होने के बाद भी दर्शकों की तालियां बटोरी.

बाद में 1970 की दशक की फिल्में 'गोरा और काला', 'लोफर', 'अमीर गरीब', 'संन्यासी' जैसी हिट फिल्मों ने उन्हें एक और नई उंचाईयों तक पहुंचा दिया.

साल 1975 में रीलीज फिल्म 'धर्मात्मा' जो अंग्रेजी फिल्म' गॉडफादर ' से प्रेरित इसमें प्रेम नाथ एकदम नये अंदाज़ में दिखे. अंडरवर्ल्ड डॉन  'धरमदास धर्मात्मा' को सिलवर स्क्रीन कुछ इस अंदाज में उतारा कि उनका ये अंदाज दर्शकों के दिलो दिमाग पर छा गया.

इस क्रम में 1974 में आई राजकपूर की सुपरहिट फिल्म 'बॉबी' में उन्होंने  डिंपल कपाड़िया के पिता की भूमिका निभाई इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिये उन्हें बेस्ट सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। इसके अलावा उन्हें शोर (1972) , अमीर-गरीब (1974), रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों में भी दमदार अभिनय के लिये फिल्म फेयर अवार्ड के लिए भी नॉमिने किया गया.

लेकिन 80  के दशक आते-आते उनके स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी और प्रेमनाथ ने फिल्मों में काम करना कम कर दिया. इस दौरान उनकी 1980 में बनी कर्ज,  1982 में क्रोधी और देशप्रेमी 1982 जैसी फिल्में आईं. साल 1985 की फिल्म 'हम दोनों' उनके सिने करियर की आखिरी फिल्म थी. बतौर निदेशक सुभाष घई के साथ उन्होंने एक बेहद सफल पारी खेली. कालीचरण, विश्वनाथ, गौतम गोविंदा, कर्ज, और क्रोधी जैसी कई सुपरहिट फिल्में उनकी झोली में आई. साथ ही राजकपूर के अलावा देवानंद और मनोज कुमार के साथ प्रेमनाथ की जोड़ी हिट साबित हुई. हिन्दी फिल्मों के अलावा प्रेम नाथ ने अमरीकी टेलीविजन के सीरियल 'माया 'में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी.  इसके अलावा अमरीकी फिल्म 'कीनर 'में भी उन्होंने अभिनय किया और इस तरह से लगभग तीन दशक तक सिल्वर स्क्रीन के इस सुनहरे सफर को आखिरकार 3 नवंबर 1992 को इस दुनिया से किसी अंजान दुनिया में 65 साल की उम्र में चले गए.

बेशक प्रेमनाथ आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जब भी किसी हिंदी सिनेमा दमदार खलनायक की चर्चा होगी तो उन्हें जरुर याद किया जाएगा.

अब आगाज़ की तरह इस लेख को अंजाम भी उन्ही के डॉयलग से करते हैं जो उन्होंने फिल्म तीसरी मंजिल में कही थी-

‘दुनियां में बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जो नामुमकिन नज़र आती हैं… लेकिन अगर इंसान हिम्मत से काम करे और वो सच्चा है…तो जीत उसी की होती है.’