नोटबंदी की मार से माओवादी भी बेहाल

सरकार के पुराने बड़े नोट बंद किए जाने के फैसले से केवल आम जनता ही नहीं बल्कि माओवादी भी बुरी तरह प्रभावित हैं।

नोटबंदी की मार से माओवादी भी बेहाल

अमितेश कुमार ओझा

सरकार के बड़े नोट बंद किए जाने के फैसले से केवल आम जनता ही नहीं बल्कि माओवादी भी बुरी तरह प्रभावित हैं। जंगल महल कहे जाने वाले माओवादियों के पुराने गढ़ पश्चिम बंगाल के तीन जिलों पश्चिम मेदिनीपुर,बांकुड़ा और पुरुलिया में इस फैसले की वजह से लाखों की रकम बर्बाद होने की आशंका है।

बताते दें कि ये जिले 2008 से 2011 तक माओवादी हिंसा का केंद्र रहे थे। कुख्यात नक्सली कमांडर कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी के नेतृत्व में माओवादियों ने लालगढ़ थाने को महीनों बंद रखा था। यही नहीं इसी दौरान सांकराइल थाने पर हमला कर थाना प्रभारी का अपहरण भी कर लिया गया था। इन तीन सालों में माओवादियों ने पुलिस जवानों समेत अनेक लोगों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी।

वहीं पुलिस, सीआरपीएफ और ईएफआर कैंपों पर हुए हमलों में भी अनेक जवानों की मौत हो गई थी। 2009 में राजधानी एक्सप्रेस को अगवा करने और 2010 में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे में भी माओवादियों की लिप्पता का आरोप लगा था। हालांकि 2011 के नवंबर महीने में कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की मुठभेड़ में मौत के बाद इस इलाके में माओवादी हिंसा में कमी आ गई। जो धीरे – धीरे लगभग खत्म सी हो गई । लेकिन नोटबंदी के बाद ऐसी सूचना है कि माओवादी घने जंगलों में छिपा कर रखे गए अपने गुप्त धन को लेकर बेचैन हो उठे हैं।

सूत्रों के मुताबिक घने जंगलों में स्थित लालगढ़ , बीनपुर और नयाग्राम थाना क्षेत्रों में माओवादियों ने लाखों की रकम छिपा कर रखी हुई है। सूत्र बताते हैं कि माओवादी अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए नगदी अपने तरीके से अल्यूमिनयम के टिफीन बॉक्स और बक्से में भर कर उसे जंगलों में छिपा देते हैं और जरूरत होने पर उसे निकाल कर काम चलाते हैं। लेकिन सरकार के नोटबंदी से मोटी रकम के बर्बाद हो जाने का डर है। पुलिस के लिए राहत की बात है कि इस इलाके में दहशत का पर्याय रहे किशनजी, सिद्धू सोरेन , शशधर महतो और मनोज महतो आदि मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं।

वहीं सिपाही टुडू, रंजीत पाल , मदन महतो और कल्पना माईती आदि जेल में है। लेकिन पुलिस को आशंका है कि अब तक फरार चल रहे जयंत और आकाश की मदद से जेल में बंद माओवादी जंगलों में छिपा कर रखे गए नगदी को ठिकाने लगाने की कोशिश कर सकते हैं। इस कार्य में दूसरे राज्यों के माओवादियों की मदद लिए जाने की संभावना से भी पुलिस इनकार नहीं कर रही हैं। इस बाबत पुलिस अधिकारी आधिकारिक तौर पर कुछ कहने से तो बचते हैं , लेकिन इतना जरूर मानते हैं कि दूसरे राज्यों से आकर माओवादी किसी भी तरह जंगलों में छिपा कर रखे गए नगदी का इस्तेमाल न कर सकें, इस ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। खुफिया तंत्रों की सहायता भी ली जा रही है।