सुनिश्चित हो 'जरूरी लेकिन सुरक्षित रक्तदान'  

अक्सर ऐसा ही होता भी है। आज देश के हर हिस्से में छोटे- बड़े अस्पताल है, जिसमें रक्त जमा करके रखने के लिए रक्त बैंक भी। लेकिन यह हमेशा जरूरतों को पूरा करने में नाकाम साबित होते हैं।

सुनिश्चित हो

अमितेश कुमार ओझ

आधुनिकता और उन्नति के शीर्ष सोपानों पर सवार यह दुनिया हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाती है। कहने को तो इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। क्योंकि इस दौर में कोई न कोई दिवस अक्सर मनाया ही जाता है। लेकिन एड्स और इस बहाने रक्तदान की उपयोगिता व खतरे के लिए मनाए जाने वाले इस दिवस का अलग महत्व है। यह कुदरत की असीम ताकत का ही प्रमाण है कि विकास के नए- नए सोपानों के बावजूद विश्व का विज्ञान आज भी खून का विकल्प तैयार नहीं कर पाया है। इसके लिए मनुष्य आज भी पूरी तरह से प्रकृति प्रदत्त रक्त पर निर्भर है। यह भी बड़ी बात है कि मरीज को जरूरी नहीं कि उसके परिजनों का रक्त मुफीद पड़े। यह किसी गैर के समूह के रक्त से भी मेल खा सकता है।

अक्सर ऐसा ही होता भी है। आज देश के हर हिस्से में छोटे- बड़े अस्पताल है, जिसमें रक्त जमा करके रखने के लिए रक्त बैंक भी। लेकिन यह हमेशा जरूरतों को पूरा करने में नाकाम साबित होते हैं। क्योंकि खून की मांग उपलब्धता से काफी अधिक है। इस रक्त की मांग को पूरा करने का सहज मार्ग है रक्तदान शिविर। लेकिन विडंबना है कि देश के सभी हिस्सों में रक्तदान को लेकर अपेक्षित जागरूकता नहीं है। ज्यादातर प्रदेशों में लोग रक्तदान के नाम से कतराते हैं। भले ही सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं प्रोत्साहन के तमाम उपाय करें। जबकि व्याप्त धारणा के विपरीत सच्चाई बिल्कुल अलग है। क्योंकि रक्तदान से खून दान करने वाले को हानि के बजाय लाभ ही होता है। रक्त देने के साथ ही शरीर में नया रक्त बनने लगता है जो शरीर की मजबूती के लिए जरूरी है। लेकिन इसके बावजूद 10 में 7 लोग रक्तदान से किसी न किसी बहाने कतराते हैं। ऐसे मरीज भी जो अपने किसी परिजन के बीमार होने पर खून के लिए इधर-उधर भटकते हैं , परेशान होते हैं, व्यवस्था को कोसते हैं। लेकिन विपत्ति टल जाने के बाद वे भी इसे भूल जाते हैं। यह नहीं सोचते कि जिस तरह उसकी विपत्ति में किसी के द्वारा दिया गया रक्त ही उसके प्रिय को चढ़ाया गया, इसी तरह रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने  में उसका भी कुछ योगदान होना चाहिए। जिससे और कोई इस परिस्थिति में न फंसे जिससे वह गुजरा है।

नियमित और जरूरी रक्तदान के साथ एड्स के लगातार बढ़ते खतरे को देखते हुए इसका सुरक्षित होना भी नितांत ही जरूरी है। क्योंकि सामान्य सी भूल पर संक्रमित रक्त की चपेट में आया मरीज ही नहीं बल्कि उसके परिजनों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। यह सुनिश्चित करने में सरकार ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका है। आज समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थाएं सक्रिय हैं। लेकिन दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि देश के हर हिस्से में रक्तदान को प्रोत्साहित करने वाली संस्थाएं समान रूप से सक्रिय हैं। खास तौर से हिंदी पट्टी में इसका घोर अभाव है। जबकि यह कड़वी सच्चाई है कि आपदा की स्थिति में चाहे कोई कितना ही बड़ा ओहदेदार हो या धनकुबेर। रक्त की आवश्यकता की स्थिति में उसे इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं मिल सकता।

रक्त की उपलब्धता उसी तरीके से सुनिश्चित हो सकती है जब कोई इसे उपलब्ध कराए। इस मामले में धन या प्रभाव का कोई महत्व नहीं है। जबकि रक्त बैंकों की भी मांग को पूरा करने की एक सीमा है। इसलिए सरकार को अविलंब विश्व एड्स दिवस पर नियमित और निर्बाध ही नहीं बल्कि सुरक्षित रक्तदान सुनिश्चित करने का संकल्प लेना चाहिए। एड्स निवारण पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा नियमित रक्तदान शिविरों के आयोजन पर व्यय होना चाहिए। यही नहीं रक्तदाताओं के साथ ऐसे शिविर आयोजित करने वाली समाजसेवी संस्थाओं और स्वयंसेवकों को सरकार की ओर से अतिरिक्त सुविधा और मान-सम्मान भी दिया जाना चाहिए। जिससे वे उच्चतम प्रेरणा के साथ अपने ध्येय में लगे रह सकें।