गरीबों-किसानों की आड़ में राजनीति

सरकार ने किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कई कदम उठाने का एलान किया जिससे उनको राहत मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए। सबसे बड़ा एलान तो सरकार की तरफ से ये किया गया कि नबार्ड अगले कुछ दिनों में जिला सहकारी बैंकों को राज्य सहकारी बैंकों के माध्यम से इक्कीस हजार करोड़ रुपए उपलब्ध करवाएगी।

गरीबों-किसानों की आड़ में राजनीति

- अनंत विजय

विमुद्रीकरण के एलान के बाद से ही पक्ष और विपक्ष में गरीबों और किसानों के हितों को लेकर तलवारें खिची हुई हैं। विपक्ष लगातार ये आरोप लगा रहा है कि सरकार के नोटबंदी के फैसले का असर सबसे ज्यादा गरीबों और किसानों पर पड़ेगा। फसल की बुआई के वक्त के मद्देनजर विपक्ष सरकार से किसानों को रियासत देने की मांग को लेकर आंदोलनरत है उधर सरकार का दावा है कि किसानों के हितों की अनदेखी नहीं होने दी जाएगी। विपक्ष के आरोपों को अगर हम आंकड़ों की कसौटी पर कसते हैं तो उनके दावे कमजोर नजर आते हैं। अगर हम नेशनल सैंपल सर्वे संगठन के उस सर्वेक्षण के नतीजों का विश्लेषण करें जो देश के विभिन्न आय वर्ग के करीब पांच लाख लोगों के बीच किए गए थे तो उन आंकड़े से एक अलग तस्वीर बनती है। सर्वे के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गरीब या कम आयवर्ग के लोग पांच सौ या हजार के नोट बदलने के लिए बैंक में कम जा रहे होंगे। उस विश्लेषण से ये निष्कर्ष भी निकलता है कि गरीबों की बचत का बड़ा हिस्सा पांच सौ या हजार के नोट की शक्ल में नहीं होता है। रोज कमानेवाले और रोज खर्चनेवाले जो भी बचत करते हैं उसकी राशि बहुत कम होती है। वो जितना कमाते हैं उसका बड़ा हिस्सा वो रोजाना खर्च कर देते हैं। आकड़ों के मुताबिक रोजाना कमाने वाले ग्रामीणों की साप्ताहिक आय करीब चौदह सौ रुपए है जो कि शहरी इलाकों में बढ़कर करीब दो हजार रुपए हो जाती है। अब अगर हम विचार करें कि उनका साप्ताहिक बचत कितना होगा। सरकार ने नोटबंदी के पहले हफ्ते में चार हजार रुपए प्रतिदिन बदलने का विकल्प दिया था। अगर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के दिहाड़ी मजदूर अपना पूरा पैसा भी बचा लें तो पुराने नोट बदलने की सीमा उनके आय के अनुपात में काफी था। दो हजार प्रतिदिन कर देने से भी उनके सामने कठिनाई आई हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। तो क्या माना जाए कि बैंकों के आगे जो लाइन दिखाई दे रही थी वो उन धन्ना सेठों ने लगवाई थी जो गरीबों के मार्फत अपना उल्लू सीधा करना चाह रहे थे। जनधन योजना के बैंक खातों में इक्कीस हजार करोड़ रुपए जमा होना भी कुछ इसी तरह का संकेत दे रहा है।

अब रही बात किसानों और छोटे निवेशकर्ताओं की तो सरकार ने किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कई कदम उठाने का एलान किया जिससे उनको राहत मिलने की उम्मीद की जानी चाहिए। सबसे बड़ा एलान तो सरकार की तरफ से ये किया गया कि नबार्ड अगले कुछ दिनों में जिला सहकारी बैंकों को राज्य सहकारी बैंकों के माध्यम से इक्कीस हजार करोड़ रुपए उपलब्ध करवाएगी। ये राशि किसानों को फसल के लिए कर्ज देने के काम आएगी। वित्त विभाग में आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास के मुताबिक देश के करीब चालीस फीसदी छोटे किसान बुआई के सीजन में कर्ज के लिए इन जिला सहकारी बैंकों पर निर्भर रहते हैं। नबार्ड के इक्कीस हजार करोड़ रुपए मुहैया करवाने से इन जिला सहकारी बैंकों को प्राथमिक कृषि सहकारी संघों के माध्यम से किसानों को कर्ज देने में सहूलियत होगी। इसके अलावा सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए पहले भी कई कदम उठाए हैं जिसमें खाते से पच्चीस हजार प्रति सप्ताह निकालने से लेकर सरकारी दुकानों से बीज खरीदने के लिए पुराने पांच सौ और हजार के नोट के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई थी। इसके अलावा सरकार ने पोस्ट ऑफिस के खातों में पुराने नोट जमा करने की छूट भी दे रखी है। सरकार ने एक और बड़ी राहत देते हुए डेबिट और क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल पर सर्विस टैक्स से भी इकतीस दिसंबर दो हजार सोलह तक छूट देने का एलान किया है। इससे ग्राहकों के साथ-साथ कारोबारियों को भी बड़ी राहत मिलेगी। सरकार की इस घोषणा के बाद कई निजी बैंकों ने भी ये छूट देने का एलान कर दिया है। हां सरकार ने पीपीएफ, पोस्ट ऑफिस सेविंग स्कीम, नेशनल सेविंग स्कीम और किसान विकास पत्र के लिए पुराने नोट देने पर पाबंदी लगा दी है। इससे इन स्कीमों में कालेधन को सफेद करने की मंशा पाले बैठे लोगों पर कुठाराघात हुआ है। हमारे देश में लंबे समय से गरीबों और किसानों को आगे करके राजनीति की जाती रही है और ये ऐसा संवेदनशील मामला है जिसका फायदा अबतक राजनीतिक दल उठाते रहे हैं।

दरअसल अगर हम देखें तो आठ दिसंबर को जब प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का एलान किया तो उसके बाद से पूरे देश में कई विद्वान अर्थशास्त्री सामने आ गए और प्रधानमंत्री के इस कदम की आलोचना करने लगे। सरकार के इस कदम को अर्थव्यवस्था और गरीब किसान विरोधी करार दिया जाने लगा। अर्थशास्त्र के इस विषय को राजनीति का विषय बनाकर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए जाने लगे। सोशल मीडिया पर तो जैसे अर्थशास्त्रियों की बाढ़ ही आ गई। एक सौ चालीस शब्दों में भी विमद्रीकरण के आसन्न खतरों को लिखा जाने लगा। यह सही है कि शुरुआत में आम जनता को नोटबंदी के इस फैसले से परेशानी हुई लेकिन करीब पखवाड़े भर में बैंकों के आगे की कतार कम हो गई। देशभर के पचास प्रतिशत एटीएम को नई करेंसी के हिसाब से तैयार कर दिया गया। दरअसल अगर देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के इस फैसले को लागू करके बड़ा रिस्क लिया है जो अगर वो नहीं भी लेते तो कोई फर्क नहीं पड़ता और उनकी राजनीति चलती रहती। नोटबंदी के पहले हो रहे तमाम सर्वे के नतीजे सब बता रहे थे कि मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। बावजूद ये जोखिम उठाना इस बात के संकेत तो देता ही है कि नरेन्द्र मोदी देश को बड़े बदलाव के लिए तैयार कर रहे हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।)

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-अनंत विजय