सज गए छोटे दलों के दफ्तर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में केवल सपा-बसपा, भाजपा और कांग्रेस हिस्सा लेगी तो यह आपका भ्रम है। प्रदेश में ऐसे राजनीतिक दलों ने भी विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है जिनका नाम लोगों ने सुना ही नही....

सज गए छोटे दलों के दफ्तर

-नरेन्द्र कुमार वर्मा

अपना दल की अनुप्रिया पटेल और पीस पार्टी के ड़ॉक्टर अयूब को उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहचान मिल चुकी है। पीस पार्टी और अपना दल राज्य में अंसारी समाज और कुर्मियों के दल के तौर पर पहचाने जाते है मगर दूसरी जातियों के नेताओं का भी इन दलों के साथ खासा जुड़ाव देखा जा रहा है। एक लंबी राजनीतिक लड़ाई के बाद पीस पार्टी और अपना दल की राजनीतिक ताकत में इजाफा हुआ। इसी तर्ज पर दूसरे राजनीतिक दल भी 2017 के विधानसभा चुनावों में कामयाब होने का सपना देख रहे है।

जय भारत समानता पार्टी (डॉ.हेमंत कुश्वाह) राष्ट्रीय आर्थिक स्वतंत्रता दल (सुरेन्द्र कुश्वाह) राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी (आर.के. चौधरी) राष्ट्रीय कामगार पार्टी (पीसी पंतजलि) लोकप्रिय समाज पार्टी (जयराम सिंह) भारत क्रांती रक्षक दल (लाखन सिंह) गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (हंसराज धुर्वे) भारतीय समाज पार्टी (ओमप्रकाश राजभर) अखिल भारतीय लोकहित पार्टी (राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी) अति पिछड़ा महासंघ  (डॉ.कर्ण सिंह प्रजापति) इत्तेहाद-ए-मिल्लत कोंसिल (तौकिर रजा खां) जनवादी पार्टी (डॉ. संजय चौहान) महान दल (केशव मौर्य) मोमीन कांफ्रेस (हसन आरिफ अंसारी) पारख महासंघ ( कौशल किशोर पासी) उदय मंच ( गोरखनाथ निषाद) नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी (अरशद खां) अवामी समता पार्टी ( रामसुमझ पासी) जनसत्ता पार्टी ( डॉ कर्ण सिंह सैनी) वंचित जमात पार्टी (चतर सिंह कश्यप) लेबर पार्टी (भारत सिंह बघेल) राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा (हरिवंश सिंह ) राष्ट्रीय जनवादी पार्टी क्रांतिकारी (हरिशचंद्र) उलेमा कोंसिल ( मौलाना आमिर रशदी) प्रगतिशील मानव समाज पार्टी (प्रेमचंद बिंद) यह उन दलों की सूची है जो विधानसभा चुनावों में थोक के भाव से अपने उम्मीदवारों को खड़ा करेंगे।

दिलचस्प बात यह हैं कि इस तरह के छोटे दलों की बागडोर एक या दो लोगों के हाथों में ही है। विधानसभा चुनावों की आहट होते ही इन दलों के दफ्तर गुलजार हो गए है। टिकट चाहने वालों की तलाश चल रही है और जीत का भी पूरा दावा किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल जनसंख्या वाले राज्य में छोटे दलों की संख्या दूसरे राज्यों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। खासबात यह हैं कि इन दलों को एक विशेष जाति समुदाय से जोड़ कर बनाया गया है। राज्य में अति पिछड़ी जातियों के संपन्न और शिक्षित लोगों ने राजनीतिक दलों का गठन कर रखा है। उसके पीछे तर्क हैं कि जाति के लोगों को जागरुक करने के लिए उन्होंने बीड़ा उठाया है। जातियों के बीच इन दलों की घुसपैठ को इस बात से समझा जा सकता है कि कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी को महान दल के साथ गठजोड़ करना पड़ जाता है। वही भाजपा अपना दल के साथ गठजोड़ करती है तो सपा को कौमी एकता दल का हाथ थामना पड़ता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।)

नोट-तस्वीर प्रतीकात्मक है।