जनकवि "विद्रोही" भी क्या तगड़ा कवि था !

जनकवि रमाशंकर यादव विद्राेही का आज 8 दिसंबर काे पुण्यतिथि है, वह हिंदी के लोकप्रिय आैर प्रगतिशील परंपरा का महान कविआें में से एक माने जाते हैं...

जनकवि "विद्रोही" भी क्या तगड़ा कवि था !

तीन दश्क तक जेएनयू में रहने वाले रमाशंकर यादव विद्राेही जी का आज 8 दिसंबर काे पुण्यतिथि है, चेहरे पर दुर्बलता लिए विद्राेही जी हमेशा फटे पुराने गंदे कपड़े पहने नजर आते थे। लेकिन "विद्रोही" कोई साधारण आदमी नहीं थे। वे हिंदी के लोकप्रिय आैर प्रगतिशील परंपरा के महान कविआें में से एक माने जाते हैं। वे जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी से हिन्दी से स्नातकाेत्तर के छात्र थे आैर जेएनयू के छात्राें के साथ उनका संघर्ष चलता रहा। अकसर वह जेएनयू के गंगा ढाबे पर कविता सुनाते नजर आ जाते थे। अगर वह जेएनयू में नजर न आते तो समझ लीजिए कि छात्रों के साथ किसी विरोध मार्च में शिरकत करने गए हाेगें, जहां अपनी ओज भरी कविताओं से वे उत्साह बढ़ाते थे।

बताया जा रहा है कि पिछले वर्ष हुए छात्रों के आंदोलन ऑक्यूपाई यूजीसी में भी वे शरीक हो रहे थे, इस आंदोलन के तहत जंतर-मंतर तक आयोजित एक विरोध मार्च से वापस लौटकर वे सोए और सोए ही रह गए।  8 दिसंबर 2015 को 58 वर्षीय विद्रोही का निधन हो गया था।

करीब तीन दशकों से विद्रोही अघोषित तौर पर जेएनयू के स्थायी नागरिक बने हुए थे। उनकी झुर्रियां जनपक्षधरता, संघर्ष और जिजीविषा का लंबा इतिहास समेटे हुए थी। यूपी के सुल्तानपुर जिले के अइरी फिरोजपुर गांव में 3 दिसंबर, 1957 को जन्मे विद्रोही शुरू से इसी तेवर के थे। सुल्तानपुर में छात्र-जीवन के दौरान भी वे आंदोलनों में सशक्त मौजूदगी दर्ज कराते थे।

ग्रेजुएशन के बाद विद्रोही ने सुल्तानपुर के कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में एलएलबी में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी न कर सके। वे 1980 में जेएनयू में एमए करने आए। 1983 में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल बाहर कर दिया गया था। लेकिन विद्रोही जैसे शख्स से जेएनयू कहां छूटता भला। वे यहीं आकर जम गए और उसी फक्कड़ अंदाज में जी रहे थे।

आज विद्राेहीजी की कविताओं को याद करते हुए और उनकी कविताआें काे पढ़कर कहीं न कहीं हमारे अंदर का विद्राेही जाग जाता है। आज उनकी कविता ही उनके संघर्ष की पहचान बन गई है।

यहां पढ़े रमाशंकर यादव विद्राेही की दो कविताएं...


  • "मैं भी मरूंगा
    और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे   
    लेकिन मैं चाहता हूं
    कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
    फिर भारत भाग्य विधाता मरें
    फिर साधू के काका मरें
    यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
    फिर मैं मरूं- आराम से
    उधर चल कर वसंत ऋतु में
    जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
    या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
    या फिर तब जब वनबेला फूलती है
    नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
    और मित्र सब करें दिल्लगी
    कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
    कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा"॥ 


 

  • "मैं किसान हूँ
    आसमान में धान बो रहा हूँ
    कुछ लोग कह रहे हैं
    कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
    मैं कहता हूँ पगले!
    अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
    तो आसमान में धान भी जम सकता है
    और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
    या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
    या आसमान में धान जमेगा"।