अमेरिका ने सऊदी अरब के बाद भारत काे बेचे सबसे ज्यादा हथियार

भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार बनकर उभरा है।अमेरिका साल 2015 में हथियारों की बिक्री में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान पर रहा है उससे उपर सिर्फ सउदी अरब है

अमेरिका ने सऊदी अरब के बाद भारत काे बेचे सबसे ज्यादा हथियार

अपने रक्षा बलों के लिए बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की योजना बना रहा भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार बनकर उभरा है।अमेरिका साल 2015 में हथियारों की बिक्री में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान पर रहा है उससे उपर सिर्फ सऊदी अरब है। अमेरिका ने अब तक करीब 40 अरब डॉलर के हथियार भारत काे बेचे हैं। अमेरिकी कांग्रेस की शोध सेवा (सीआरएस) की ओर से जारी रिपोर्ट ‘कंवेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स टू डेवलपिंग नेशसं 2008-2015' में कहा गया है कि भारत ने 2008 से 2015 के बीच 34 अरब डॉलर के रक्षा उपकरण खरीदे, जबकि सउदी अरब ने 93.5 अरब डॉलर की खरीददारी की।

बताया जा रहा है कि पाकिस्तान सहित विकासशील देश 2015 में हथियारों के सबसे बड़े क्रेता बने रहे। कतर ने पिछले साल हथियारों के लिए 17 अरब डॉलर से अधिक के सौदे पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद क्रमश: मिस्र, सऊदी अरब का स्थान है। 'विकासशील देशों को पारंपरिक हथियार हस्तांतरण, 2008-2015' शीषर्क वाली रिपोर्ट कांग्रेस की रिसर्च सर्विस ने तैयार की है जो लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस का एक विभाग है। इसे पिछले हफ्ते सांसदों को सौंपा गया।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस बात जिक्र करते हुए कहा है वैश्विक तनाव और जोखिम से इसके कम होने के कुछ संकेत मिले हैं। हथियारों का कुल वैश्विक कारोबार 2014 के 89 अरब डॉलर से घटकर 2015 में 80 अरब डॉलर के करीब हो गया। वैश्विक हथियार बाजार में एक और वर्चस्वशाली देश रूस को हथियारों के आर्डर में मामूली कमी आई है। लातिन अमेरिकी देश खासकर वेनेजुएअला रूसी हथियारों का बाजार बन कर उभरा है। चीन हथियारों की बिक्री के मामले में साल 2014 के तीन अरब डॉलर से बढ़ कर छह अरब डॉलर पर पहुंच गया है।

गौरतलब है कि सीआरएस अमेरिकी कांग्रेस की स्वतंत्र शोध शाखा है और इसकी रिपोर्ट को अमेरिकी कांग्रेस की आधिकारिक रिपोर्ट नहीं माना जाता। उसने कहा, ‘सउदी अरब 2008-15 के दौरान हथियारों की खरीद के मामले में विकासशील दुनिया का अगवा रहा और उसने कुल 93.5 अरब डॉलर के समझौते किये।

हथियारों की खरीद के भारत के इस पैटर्न के बाद रूस को अन्य बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता देशों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। भारत रूस को यह भी आश्वस्त नहीं कर सकता था कि नई पीढ़ी के हथियार वह रूस से ही खरीदेगा। वास्तव में भारत ने 2011 में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया और फ्रांस ने बाजी मार ली थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि हथियारों की खरीद के मामले में रूस पर भारत की निर्भरता कम होने के बाद से मॉस्को ने अन्य विकल्पों पर गौर करना शुरू कर दिया है।