जागरूकता ला सकती है भारत में कैंसर से होने वाली मौतों में कमी: डॉ.रंगा राव

विडम्बना यह है कि हमारे अस्पतालों में आज अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी उपलब्ध होने के बावजूद करीबन 5,56,400 कैंसर से संबंधित मौतें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्यादातर लोग, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, कैंसर से संबंधित तथ्यों से अनजान हैं| वे इस तथ्य से अनजानहैं कि 'समय महत्त्वपूर्ण है' और 'शीघ्रतामें ही समझदारी है' !!

जागरूकता ला सकती है भारत में कैंसर से होने वाली मौतों में कमी: डॉ.रंगा राव

यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि जहां एक ओर हम स्वयं को अधिक परिष्कृत, तकनीक प्रेमी, आधुनिक, और एक यांत्रिक-उपकरण-प्रेमी प्रजाति के रूप में विकसित होता पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उतना ही अधिक हम अपने आप को कैंसर जैसे घातक रोग के चंगुल में भी फंसा पा रहे हैं| परन्तु ध्यान देने योग्य बात ये है कि यदि समय पर जांच और इलाज पर ध्यान दिया जाए तो कैंसर जैसी अत्यधिक खतरनाक और घातक बीमारी का इलाज पूरी तरह से संभव है।

नेशनल इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च (NICPR) द्वारा उपलब्ध कराए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अकेले भारत में कैंसर रोग से ग्रस्त लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 2.5 लाख है। करीब 12 लाख से अधिक नए कैंसर के रोगी हर साल अपना नाम रजिस्टर कराते हैं| परन्तु विडम्बना यह है कि हमारे अस्पतालों में आज अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी उपलब्ध होने के बावजूद करीबन 5,56,400 कैंसर से संबंधित मौतें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्यादातर लोग, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, कैंसर से संबंधित तथ्यों से अनजान हैं| वे इस तथ्य से अनजानहैं कि 'समय महत्त्वपूर्ण है' और 'शीघ्रतामें ही समझदारी है' !!

उचित जागरूकता की कमी के कारण, वहां इस बीमारी से सम्बंधित कुछ भ्रामक मान्यतायें जुड़ी हैं| इन भ्रांतियों और मिथकों पर चर्चा और उन्हें दूर करने हेतु नारदा न्यूज़ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध और एक प्रतिष्ठित ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर रोग चिकित्सक और विशेषज्ञ) डॉ (कर्नल) रंगा राव रंगाराजू के साथ बातचीत का सुअवसर मिला।

डॉ रंगा राव ने चिकित्सा क्षेत्र और सशस्त्र बलों में लगभग 30 वर्षों तकअपनी सेवा प्रदान की है। वह वर्तमान में मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, शालीमार बाग, नई दिल्ली में कैंसर विज्ञान सेवा के निदेशक और चिकित्सा कैंसर विज्ञान विभाग के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में जुड़े हुए हैं। वे एक निपुण लेखक भी हैं| शोध के आधार पर लिखे उनके कई लेख विभिन्न पत्रिकाओं और प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं| वह कैंसर और उससे जुड़ी भ्रांतियों के विरुद्ध जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कल्याणकारी संगठनों के साथ शिविरों का आयोजन करते रहते है।

डॉ रंगा राव के साथ विशेष बातचीत के अंश इस प्रकार हैं:

प्र. एक धारणा है कि अगर एक कैंसर ट्यूमर का ऑपरेशन किया जाता है, या हटा दिया जाता है, तो कैंसर कोशिकाएं(Cells) शरीर में फैल जाती हैं। क्या यह सच है? क्या मरीज को कुछ अतिरिक्त उपचारों या इलाज की जरूरत है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कैंसर फैल नहीं रहा है?

उ. नहीं| अगर सर्जरी एक प्रशिक्षित और अनुभवी सर्जन द्वारा ठीक से की गयी है तो कैंसर कोशिकाएं सर्जरी के बाद फैलती नहीं है। यह एक गलत धारणा है कि कैंसर सर्जरी के बाद फैलता है। कभी कभी, अगर ट्यूमर बड़ा है, कुछ ‘ट्यूमर कोशिकायें’ दृश्य या अदृश्य रूप में वहां विद्यमान रह सकती हैं, जो बाद में विकसित हो सकती हैं और समय के साथ फैल सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि कैंसर ट्यूमर का ऑपरेशन एक प्रशिक्षित कैंसर सर्जन ही करें न कि वे सर्जन जो ऐसे ऑपरेशन करने के लिए अनुभवी नहीं हैं। इसके अलावा इन कोशिकाओं को हटाने के लिए रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी या हार्मोन थेरेपी या इनकेसंयोजन की प्रयोजना की आवश्यकता होती है। वैसे यह एक गलत धारणा है कि कैंसर सर्जरी के बाद से फैलता है। ऐसी गलत अवधारणा शायद ऐसे कुछ अवलोकनों के बाद बनी हो जहां अनुचित तरीके से या किसी अनुभवहीन व्यक्ति द्वारा ऐसी सर्जरी की गयी हो|

प्र. क्या सभी केसों में बायोप्सी की जानी चाहिए? क्या इससे कैंसर फैलता है?

उ. बायोप्सी ज्यादातर केसों में बहुत जरूरी है। पहली बात तो बायोप्सी की मदद से इस रोग का सही आंकलन हो पाता है और दूसरा कि यह किस प्रकार का ट्यूमर है, यह पता चल जाता है जिससे इसके निदान की योजना बनाने में सहायता मिलती है| इसके साथ साथ, कुछ विशेष परीक्षणों जैसे इम्यूनो हिस्टो केमिस्ट्री(आईएचसी), द्वारा हमें इस समस्या के प्रकार और मार्करों के बारे में और अधिक जानकारी मिलती है जिसकी सहायता से हम चिकित्सा की रूपरेखा तय कर पाते हैं। उदाहरण के लिए, स्तन कैंसर में हमें विद्यमान उन हार्मोन रिसेप्टर्स की जानकारी मिलती है, जहां हमें हार्मोन थेरेपी देने की आवश्यकता है। इसी प्रकार, फेफड़ों के कैंसर में एक रिसेप्टर EGFR कहलाता है, जिसमें कीमोथेरेपी की जरूरत नहीं है और उसमें कुछ दवाइयों द्वारा‘टारगेट थेरेपी’ दीजा सकती है।

प्र. प्रायः देखा गया है कि अधिकांश मामलों में कैंसर रोगी जब तक रोग-विशेषज्ञ के पास आते हैं, तब तक उनकी बीमारी लाइलाज हो चुकी होती है| और वो भी तब जबकि वे पहले से अन्य डॉक्टरों की देखरेख में होते हैं। ऐसा क्यों होता है?

उ.हां, यदि विकसित देशों की तुलना में देखा जाए, तो भारत में लगभग 70%-75% रोगी कैंसर के तीसरे या चौथे चरण में विशेषज्ञ के पास आते हैं, जबकि विकसित देशों में इस स्टेज पर आने वाले रोगियों की संख्या 20%-30% है| इस कारण उनके इलाज की न केवल संभावना कम हो जाती है, बल्कि अधिक महंगे उपचार और अत्यधिक मानवीय पीड़ा की स्थिति भी पैदा हो जाती है। यह देरी कई कारणों की वजह से है। सबसे पहला कारण, विभिन्न सामाजिक परिस्थितिवश उत्पन्न कई कारणों स्वरुप मरीज का लक्षणों से अनजान होना है। दूसरा, लक्षणों का अस्पष्ट और हल्के होना है कि वे कैंसर के लक्षण के रूप में समझ नहीं आते हैं। तीसरा, वे लक्षण कभी कभी टीबी या कुछ अन्य पुरानी आम बीमारियों के जैसे लगते हैं, उदाहरण के लिए, फेफड़ों के कैंसर को प्रायः टीबी समझ कर महीनो उसी का इलाज किया जाता है, और जब तक यह समझ में आता है कि बीमारी क्या है, तब तक कैंसर अपने चरम तक पहुंच चुका होता है| चौथे, देरी कभी-कभी एक डॉक्टर के साथ परामर्श के बाद भी होती है। सही एवं सटीक परीक्षणों के अभाव में अथवा भ्रामक एवं गलत रिपोर्ट के कारण भी ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है| संक्षेप में, साक्षरता, सामाजिक स्थिति, अनुभवहीनता आदि कई कारणों की वजह से जनता और डॉक्टरों के बीच जागरूकता की कमी है।

इसके अलावा, कुछ सर्जन या डॉक्टर किन्हीं कारणों की वजह से एक संदिग्ध कैंसर रोगी तक को एक कैंसर विशेषज्ञ के पास नहीं भेजते, जो दुर्भाग्य से मरीज के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। समय से कैंसर चिकित्सा विशेषज्ञों के पास भेजे जाने से एवं उचित और समय पर इलाज कराने से रोगी की जान बचाई जा सकती है।

लोगों को भी कैंसर के लक्षणों के बारे में पता होना चाहिए| उन्हें ये पता होना चाहिए की इस मामले में उन्हें क्या करना है, एक कैंसर-चिकित्सक के पास स्वयं जाना है या खुद को एक कैंसर-विशेषज्ञ के पास भेजे जाने के लिए अपने डॉक्टर से स्वीकृति लेनी है।

कैंसर के प्रति जागरूकता के स्तर को खोजने के लिए हम सार्वजनिक, नर्सों, अस्पताल के कर्मचारियों, मरीजों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच एक सर्वेक्षण कर रहे हैं। बाद में हम डॉक्टरों के बीच भी यह सर्वेक्षण करेंगे। निम्नलिखित सर्वेक्षण (सर्वेक्षण में शामिल होने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें) सभी लोगों के बीच जानकारी की कमी का पता लगाने और तदनुसार जागरूकता कार्यक्रमों को निर्देशित करने में हमारी मदद करेगा।

https://www.linkedin.com/pulse/cancer-awareness-india-ranga-rao-rangaraju

प्र.कैंसर का पता काफी देर से क्यों चलता है?

उ.कैंसर रोग काफी बाद की स्टेज पर तब पता चलता है जब मरीज के ट्यूमर का आकार बड़ा हो जाता है। दुर्भाग्य से, जब कैंसर ट्यूमर छोटा होता है, यह किसी भी लक्षण का संकेत नहीं देता। सबसे छोटा ट्यूमर जो मरीज या चिकित्सक द्वारा पता लगाया जा सकता है, आकार में लगभग 1 सेमी होताहै। तब तक, ट्यूमर शरीर में काफी समय बिता चुका होता है, 30 गुणा हो चुका होता है, और कोशिकाओं की छोटी संख्या दूर अंगों में फैल गयी  होती है। एक व्यक्ति को मारने के लिए इसे मात्र और 10 से 12 गुणा की जरूरत होती है। कभी कभी तो लक्षण इतने अस्पष्ट होते है कि वे नजरअंदाज हो जाते हैं।

प्र.इतने अधिक लोगों को आज कैंसर क्यों हो रहा है?

उ.कैंसर मधुमेह, उच्च रक्तचाप या दिल के दौरे की तरह ही एक जीवन शैली रोग है। लम्बे समय तक जीवन शैली में परिवर्तन द्वारा कोशिकाओं में विभिन्न परिवर्तन, उनमें उत्परिवर्तन (Mutation) और अंततः कैंसर होते पाया गया है। जीवन शैली से तात्पर्य आहार की आदतों, शराब-सेवन, किसी भी रूप में तंबाकू,अधिक वजन, प्रजनन और यौन आदतों, पर्याप्त व्यायाम की कमी, विकिरण के संपर्क में आना, प्रत्यारोपण में प्रतिरक्षा दमन, हेपेटाइटिस बी जैसे संक्रमण, मानव पैपिलोमा वायरस आदि आते हैं| वर्षों में जीवन शैली में इतने सारे बदलाव आये है| लोगोंं नेआसान और आरामदायक जीवन शैली के लिए अच्छी आदतों को छोड़ दिया है|

प्र.इसके पीछे क्या कारण है कि जबकि काफी अधिक संख्या में लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं, परन्तु कैंसर केवल उनमें से कुछ ही लोगों कोहोता है?

उ.उनकी मजबूत प्रतिरोधक क्षमता के कारण! ऐसा पाया गया है कि‘कुछ’ है जो इन तत्वों के विरुद्ध उनकी रक्षा कर रहा है| मानव शरीर में कुछ अच्छे वंशाणु (Genes) होते हैं,तो कुछ बुरे। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता एवं सदोष वंशाणु वाले व्यक्ति मजबूत प्रतिरोधक क्षमता और अच्छे वंशाणु वाले लोगों के मुकाबले कैंसर रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। विज्ञान के लिए यह समझने की शुरुआत है। मानव शरीर में जीन और प्रतिरोधक क्षमता का एक सुंदर संतुलन कैंसर से मानव शरीर की रक्षा करता है। जब इस संतुलन में उतार-चढ़ाव आते हैं, तब यही उत्परिवर्तन कैंसर के कारण बनतेहैं।

प्र.सदोष वंशाणु(Bad Gene) का क्या मतलब है?

उ.इसे एक उदाहरण देकर आपको समझाता हूं। एक आदमी ने तब धूम्रपान शुरू कर दिया जब वह 10 साल का था। आज वह व्यक्ति साठ वर्ष का है और अभी भी ठीक है। पचास साल तक धूम्रपान करने के बावजूद वह आज भी स्वस्थ है क्योंकि उसके शरीर में अच्छे वंशाणु (Good Gene) हैं| जबकि, एक और व्यक्ति है जो केवल दस साल से धूम्रपान कर रहा है, कैंसर रोगी हो गया है क्योंकि उसके शरीर में सदोष वंशाणु (Bad Gene) है जिन्हें कैंसर पैदा करने वाले जीन या 'ओंकोजीन' के रूप में भी जाना जाता है। असल में ये परिवर्तित अच्छे जीन हैं, जो उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) से बदल रहे हैं। इसके अलावा, हमारे शरीर में कैंसर से रोकथाम वाले जीन भी मौजूद होते हैं, उनमें भी किसी उत्परिवर्तन अथवा असंतुलन का परिणाम कैंसर होता है।

प्र.क्या सभी कैंसर रोगियों के बच्चों को भविष्य में कैंसर होने का खतरा होता हैं?

उ. देखें, यह सच है कि उनके जीन में ‘वह’ है। लेकिन, ऐसा होने की केवल 5% -10%संभावना ही होती है। जीन अन्य कारकों जैसे- पर्यावरणीय कारकों, आहार, जीवन शैली के माध्यम से भी विकसित होते हैं। कैंसर बनने में कई साल लग जाते हैं। परिवार से कैंसर के जीन विरासत में 5%रोगियों को मिलते हैं।

पहले कैंसर के मामले बहुत कम हुआ करते थे। पर्यावरण कैंसर से बचाव में हमारी रक्षा करता था। आज, हमारी प्रतिरोधक क्षमता भी पर्यावरण से प्रभावित होती है। आज हम इस लड़ाई में हार रहे हैं क्योंकि अब पर्यावरण भी हमारी रक्षा करने के लिए नहीं है, बल्कि हमारी प्रतिरोधक क्षमता के स्तर को नुकसान पहुंचा रहा है। हमारी कमजोर प्रतिरोधक क्षमता, खराबजीवन शैली के कारण, आज हम इस बीमारी से इस कदर प्रभावित हो रहे है एवं उसके शिकार हो रहे हैं।

प्र.आखिरी सवाल, क्या वास्तव में वर्त्तमान स्थिति काफी गंभीर है? क्या कैंसर का इलाज ठीक से नहीं हो पा रहा है?

उ.यह हरेक केस की स्थति पर निर्भर करता है। अगर जांच, समय पर इलाज, आदि जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर रोगी एवं उसके परिवारजन संपूर्ण रूप से ध्यान रखे, तो निश्चित ही एक बहुत बड़ी संख्या में कैंसर के रोगियों का इलाज संभव है| लेकिन, मैं फिर से दोहराऊंगा कि लोगों के बीच जागरूकता बहुत मायने रखती है। कैंसर का संदेह होने पर तुरंत कैंसर रोग चिकित्सा विशेषज्ञ (oncologist) को जाकर दिखायें| जागरूकता भारत में कैंसर से संबंधित मौतों की संख्या में कमी ला सकती है।