उत्तराखंड का भागीरथी मास्टर प्लान सरकार ने किया खारिज

उत्तराखंड सरकार वापस तो आई लेकिन कुछ कर नहीं पाई हमारा मतलब है कि पहले तो उत्तराखंड सरकार पर भागीरथी पर्यावरण संवेदी क्षेत्र के लिए जोनल मास्टर प्लान को तैयार करने में कई साल लगे और उसमें भी कई कमियों की वजह से सवालिया निशान लग गए...

उत्तराखंड का भागीरथी मास्टर प्लान सरकार ने किया खारिज


उत्तराखंड सरकार वापस तो आई लेकिन कुछ कर नहीं पाई हमारा मतलब है कि पहले तो उत्तराखंड सरकार पर भागीरथी पर्यावरण संवेदी क्षेत्र के लिए जोनल मास्टर प्लान को तैयार करने में कई साल लगे और उसमें भी कई कमियों की वजह से  सवालिया निशान लग गए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में वन और पर्यावरण मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय की ओर से दाखिल संयुक्त हलफनामे में कहा गया है कि उत्तराखंड सरकार ने जो जोनल मास्टर प्लान बनाया है वो स्वीकार करने करने के काबिल नहीं है। यह प्लान कई तरह की कमियों के साथ अधिसूचना की मूल भावना के भी विरुद्ध है।


गौरतलब है कि एनजीटी के आदेश के बाद 100 किलोमीटर दायरे वाले भागीरथी पर्यावरण संवेदी क्षेत्र को लेकर बृहस्पतिवार को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय में दूसरी बैठक की गई। इस बैठक में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक व उत्तराखंड के मुख्य सचिव समेत विभिन्न विभागों के आला अधिकारी शामिल हुए। बैठक में उत्तराखंड सरकार की ओर से कहा गया कि भागीरथी पर्यावरण संवेदी क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए रास्ता खुलना चाहिए। इसको लेकर 2012 में जारी की गई अधिसूचना की वजह से राज्य में कई विकास कार्य रुके हुए हैं।




बैठक में उत्तराखंड सरकार के तर्कों पर सवाल उठाया गया। सदस्यों का कहना था कि जोनल मास्टर प्लान हिमालय की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए। सदस्यों ने कहा कि गोमुख से उत्तरकाशी तक गंगा को अविरल और निर्बाध रखना ही उचित होगा। वहीं सूत्रों के मुताबिक बैठक के दौरान जल संसाधन मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार की ओर से रखी गई मांगों को स्वीकार करने से मना कर दिया है।

इस मामले पर पर्यावरण मंत्रालय के  एक सचिव स्तरीय अधिकारी ने कहा कि जब तक प्लान पूरी तरह अधिसूचना के अनुकूल नहीं होगा तब तक मंजूरी नहीं दी जाएगी। उत्तराखंड सरकार पर्यावरणीय संवेदी इलाके में विकास के नाम पर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को मंजूरी और लैंड यूज बदलने जैसे अधिकार और छूट चाहती है वहीं पर्यावरणविद और केंद्रीय मंत्रालय इन बातों पर सहमत नहीं हैं।

वहीं एनजीटी में केंद्र की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि उत्तराखंड सरकार की ओर से दो बार दिए गए प्लान में कई तरह की कमियां है। मसलन पर्यावरण संवेदी क्षेत्र को लेकर कोई भी मूलभूत अध्ययन नहीं किया गया है। वहीं इस प्लान में 2012 की अधिसूचना में दी गई कई गाइडलाइन का भी उल्लंघन शामिल है।