जानिए क्यों बुजुर्गों से लेकर युवाओं के बीच आज भी जिंदा है गालिब

गालिब एक ऐसे शायर थे जिनके शयरों की लाइने आज भी लोगों की जुबा पर होती हैं। उनके शायरों की कुछ लाइने तो ऐसी हैं जिससे हर पीडी के लोगों को आज भी याद है, फिर चाहे वो युवा हो या बुजुर्ग। हर किसी की जुबा पर आज भी गालिब ही गालिब है...

जानिए क्यों बुजुर्गों से लेकर युवाओं के बीच आज भी जिंदा है गालिब

गालिब एक ऐसे शायर थे जिनके शयरों की लाइने आज भी लोगों की जुबा पर होती हैं। उनके शायरों की कुछ लाइने तो ऐसी हैं जिससे हर पीडी के लोगों को आज भी  याद है, फिर चाहे वो युवा हो या बुजुर्ग। हर किसी की जुबा पर आज भी गालिब ही गालिब है। उनकी कुछ लाइने तो बहुत ही मशहूर हैं जैसे- 'हैं और भी दुनिया में सुखन्वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और'  इस लाइन से साफ जाहिर होता है कि सच में गालिब का अंदाज सबसे जुदा है। मशहूर शायर मिर्जा असदुल्लाह खां (गालिब) की आज जयंती है। उनकी जयंती पर हम आपको उनसे जूड़ी कुछ खात बातें बताएंगे।

गालिब का जन्म आगरा में 27 दिसंबर सन् 1796 में हुआ था। वो एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से ताल्लूक रखते थे। आगरा की जिस हवेली में गालिब का जन्‍म हुआ था, वह जोधपुर के राजा सूरजसिंह के पुत्र गजसिंह की थी। गालिब पर प्रामाणिक विद्वान मालिकराम ने इसे साबित किया है। गालिब के हवाले से नाजिम और निजाम नाम की दो शख्सियतों का सूर्यनगरी से गहरा जुड़ाव है। जोधपुर को सूर्यनगरी या नीला नगर के नाम से भी जानी जाती है। मिर्जा गालिब पहले शागिर्द थे - मर्दान अली खां, जो राना, मुज्तर। ये दोनों नाजिम और निजाम उपनाम से शायरी करते थे।

बता दें कि पाकिस्तान से प्रकाशित जोधपुर के शरफुद्दीन यक्ता की किताब बहारे-सुखन और राजस्थान उर्दू अकादमी से छपने वाली शीन काफ निजाम की किताब "मआसिर शौअरा-ए- जोधपुर" में मर्दान अली खां के बारे में जिक्र मिलता है। चूंकि गालिब का जन्‍म जोधपुर के राजा की हवेली में हुआ है, इस नाते भी जोधपुर से उनका बहुत गहरा रिश्ता है। गालिब के शेरों में जान डालने के लिए शीन काफ निजाम की बहुत बड़ी भूमिका है।

गालिब ने अपनी जिंदगी का लंबा वक्त आगरा शहर के बाजार सीताराम की गली कासिम जान में बनी हवेली में गुजारा है। इस हवेली को संग्रहालय का रुप दे दिया गया है जहां पर गालिब का कलाम भी देखने को मिलता है। प्यार से उन्हें लोग मिर्जा नौशा के नाम से भी पुकारते थे।गालिब ने महज 11 साल की उम्र से ही उर्दू और फारसी में शेरों शायरी लिखना शुरू कर दिया था। गालिब उर्दू और फारसी भाषा के महान शायर थे। 13 साल की उम्र में उनका निकाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हुआ था।

गौरतलब है कि गालिब और असद नाम से लिखने वाले मिर्जा मुगल काल के आखिरी शासक बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि भी रहे हैं। आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी जिन्दगी गुजारने वाले गालिब को ज्यादातर उनकी उर्दू गजलों के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने बारे में खुद ही लिखा था कि दुनिया में बहुत से कवि-शायर जरूर हैं, लेकिन उनका लहजा सबसे निराला है। उनके शेरों की कुछ लाइने ऐसी हैं जो आज भी लोगों कि जुबा पर हैं इतना ही नहीं गालिब शेरों को फिल्मी दुनिया में भी इस्तोमाल किया जाता है उनकी लाइनों को फिल्मों के डािलॉग बनाकर फिल्मों में बोला जाता है। उनके शायरों की कुछ मशहूर लाइने-

* ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए/ इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है

* उनके देखे से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक/ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

* इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया/ वरना हम भी आदमी थे काम के

* कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को/ ये ख़लिश कहां से होती, जो जिगर के पार होता

* हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले/ बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले