दलितों के घर भाजपा का पत्रक

बसपा द्वारा लगातार इस बात को प्रचारित किया जाता हैं कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है। इस दुष्प्रचार के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने एक रणनीति तैयार की है। योजना के मुताबिक पार्टी नेता दलितों के घर जाकर उन्हें एक पत्रक सौपेंगे कि केंद्र की भाजपा सरकार दलितों की सबसे ज्यादा हितैषी है....

दलितों के घर भाजपा का पत्रक

भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित जाति मोर्चे ने एक पत्रक (स्मृतिपत्र) तैयार किया है। पार्टी उत्तर प्रदेश में दलितों के घर-घर में इस पत्रक को पहुंचाएगी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तय किया हैं कि प्रदेश में पार्टी कार्यकर्ता दलितों के घर-घर जाकर यह पत्रक सौपेंगे। इस पत्रक में डॉ. अंबेडकर के जीवन से जुड़े पंचतीर्थ के काम का ब्योरा है। साथ ही केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा दलितों के विकास के लिए किए जा रहे कामकाज को भी इसमें शामिल किया है। विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी राज्य के दलितों के बीच अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहती है। इससे पहले धम्म चेतना यात्रा और दलित स्वाभिमान सम्मेलनों के जरिए राज्य के दलितों के बीच पैठ बढ़ाने का काम किया गया था।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के 100 दलित नेताओं के साथ दलितों के घर भोजन करके उनके नजदीक जाने का कोशिश की थी। अमित शाह ने अपने इन दलित नेताओं को खासे टिप्स दिए हैं। उनसे कहा गया हैं कि बसपा नेता मायावती जिस तरह से दलितों के विकास पर जुबानी खर्च करके श्रेय लूट रही हैं उसका पर्दाफाश किया जाए। इसी सिलसिले में 25 दिसंबर को पार्टी के दलित पदाधिकारियों की एक बैठक होने वाली है। इस बैठक में जनवरी से उत्तर प्रदेश में आयोजित दलित स्वाभिमान सम्मेलनों पर चर्चा होगी। 2 जनवरी को उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक बड़ी रैली है। इस रैली में ज्यादा से ज्यादा दलितों की भागिदारी रहे पार्टी नेता दिनरात इस पर काम कर रहे हैं।

डॉक्टर अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बढ़चढ़ कर का्र्यक्रम आयोजित किए थे। पार्टी अब विचार कर रही हैं कि केंद्र सरकार की दलित उत्थान वाली योजनाओं को उत्तर प्रदेश में दलितों के घर-घर जाकर प्रचारित कर उनका समर्थन हासिल करे। उत्तर प्रदेश में धोबी, कोरी, पासी, कठेरिया, मोची, बाल्मीकी, धानुक, खटिक, गोंड और तुरैहा जातियों पर भाजपा का सबसे ज्यादा फोकस है। ये सभी गैर जाटव जातियां है। चूंकि जाटवों को मायावती का एकमुश्त वोटवैंक माना जाता है लिहाजा पार्टी वहां ज्यादा मथापच्ची नहीं कर रही है। प्रदेश में दलितों की आबादी का सर्वाधिक हिस्सा जाटव वर्ग से ही आता है। इसके बाद दलित वर्ग में शामिल अन्य दूसरी जातियों की हिस्सेदारी है। ऐसा माना जाता हैं कि बसपा में जाटव वर्ग का ही सर्वाधिक फायदा होता है जबकि दूसरी दलित जातियां हाशिए पर रहती है। पार्टी नेता कहते हैं कि दलितों के नाम पर बसपा केवल छलावा करने के काम करती है। हकीकत में उत्तर प्रदेश के दलितों का विकास आज भी नहीं हो पाया।

राज्य में चुनावों की घोषणा होने वाली है लिहाजा सभी दलों ने दलितों पर फोकस करना शुरू कर दिया। जनवरी से होने वाले अनुसूचित जाति स्वाभिनाम सम्मेलन की बागडोर भी भाजपा ने गैर जाटव नेताओं को ही सौंपी है। ऐसे सम्मेलनों को पार्टी को कितना फायदा होगा यह शीघ्र ही पता चल जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।)