लापरवाही महंगी पड़ सकती है पूर्वोत्तर के आतंकवाद पर

देश के पूर्वोत्‍तर राज्यों में अलगाववदी बहुत सक्रिय हैं और हमारा पूरा ध्‍यान महज कश्‍मीर पर है, असल में पूर्वोत्‍तर में भी वही पाकिस्‍तान हरकतें कर रहा है जो कश्‍मीर में, जरूरत है कि वहां भी गंभीरता से ध्‍यान दिया जाए...

लापरवाही महंगी पड़ सकती है पूर्वोत्तर के आतंकवाद पर

पंकज चतुर्वेदी

अभी चार दिसंबर को अरूणाचल प्रदेश के तिराप जिले के जिनु गांव के पास गश्त कर रहे असम राईफल्स के एक दल पर कुछ उग्रवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें एक जूनयिर कमीशंड ऑफिसर सहित दो सैनिक शहीद हुए व आठ घायल हो गए। उससे कुछ दिन पहले ही 19 नवंबर की सुबह निसुकिया जिले के डिग्बोई तहसील में पेनगरी संरक्षित वन के करीब सेना के दो ट्रक व एक जीप के काफिले को उग्रवादियों ने पहले विस्फोट कर रोका फिर उस क्लाशनेव राईफल व आरपीजी यानि राकेट प्रोपेलेन्ड ग्रेनेड से हमला किया। इसमें तीन जवान शहीद हुए व चार बुरी तरह जख्मी। अरूणाचल वाले हमले का शक एनएससीएन-खपलांग व असम वाले संहार का अरोप उल्फा पर है। इसी साल चार जून को मणिपुर की राजधानी इंफाल से कोई 75 किलोमीटर दूर भारतीय सेना की डोगरा रेजीमेंट पर चार उग्रवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं व 18 जवानों को मार डाला। इस हमले में 11 अन्य बेहद गंभीर घायल भी हुए है। इससे पहले दो अप्रैल और छह फरवरी को अरूणाचल में सेना पर हमले हो चुके है। इन सभी हमलों का शक नागालैंड के पृथकतावादी संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल आफ नागालैंड के खपलांग गुट पर है। मुल्क में जब कभी आतंकवाद से निबटने का मुद्दा सामने आता है तो क्या आम लोग और क्या नेता और अफसरान भी; कश्मीर पर आंसू बहाने लगते हैं पाकिस्तान को पटकने के नारे उछालने लगते हैं, लेकिन लंबे समय से यह बात बड़ी साफगोई से नजरअंदाज की जाती रही है कि हमारे ‘‘सेवन सिस्टर्स’’(हालांकि अब ये एट यानि आठ हो गई हैं ) राज्यों में अलगाववाद, आतंक और देशद्रोही कश्मीर से कहीं ज्यादा है और उससे सटी सीमा के देशों - चीन, म्यंमार, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश ही नहीं थाईलैंड, जापान तक इन संगठनों के आका बैठ कर अपनी समानांतर हुकुमत चला रहे हैं। अभी मणिपुर की सरकार म्यांमार से सहयोग मांग रही है। भूटान ने एक दशक पहले कड़ी नीति अपना कर उल्फा के सभी अड्डे बंद कर दिए थे तब से नलबाड़ी इलाके में शांति है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में मणिपुर, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश और मिजोरम में कोई पच्चीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। यहां बीते बारह सालों के दौरान कोई बीस हजार लोग मारे गए जिनमें चालीस फीसदी सुरक्षा बल वाले हैं। जब किसी राज्य में कुछ महीने शांति रहती है तो माना जाता है कि सरकार ने उग्रवादी संगठनों को मनमाने तरीके से उगाही की छूट दे दी है। हालांकि पूर्वोत्तर में उग्रवाद के बीज व प्रारंभ चीन, कम्यूनिस्ट आंदोलन से कहा जाता है लेकिन यह भी गौरतलब है कि पूरे इलाके में कभी चर्च या मशीनरी के किसी भी दल, संपत्ति या गतिविधि पर उग्रवादी मार नहीं पड़ी।

असम में उल्फा, एनडीबीएफ, केएलएनएलएफ और यूपीएसडी के लड़ाकों का बोलबाला है। अकेले उल्फा के पास अभी भी 1600 लड़ाके हैं जिनके पास 200 एके राईफलें, 20आरपीजी और 400 दीगर किस्म के असलहा हैं। राजन दायमेरी के नेतृत्व वाले एनडीबीएफ के आतंकवादियों की संख्या 600 है जोकि 50 एके तथा 100 अन्य किस्म की राईफलों से लैसे हैं। बीते साल असम में दो बड़े नरसंहार करने वाले एनडीबीएफ के सांगबीजित गुट का मुखिया आईके संगबीजिहत म्यांमार में रह कर अपने व्यापाार करता है। आश्चर्य यह जान कर होगा कि बोडो के नाम पर खून खराबा करने वाला यह अपराधी खुद बोडो नहीं है। नगालैंड में पिछले एक दशक के दौरान अलग देश की मांग के नाम पर डेढ़ हजार लोग मारे जा चुके हैं। वहां एनएससीएन के दो घटक - आईएम और खपलांग बाकायदा सरकार के साथ युद्ध विराम की घोषणा कर जनता से चौथ वसूलते हैं। इनके आका विदेश में रह कर भारत सरकार के आला नेताओं से संपर्क में रहते हैं और इनके गुर्गों को अत्याधुनिक प्रतिबंधित हथियार लेकर सरेआम घूमने की छूट होती है। यहां तक कि राज्य की सरकार का बनना और गिरना भी इन्हीं उग्रवादियों के हाथों में होता है। यह बात हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में सामने आ चुकी है। कांग्रेस बहुत प्रचार कर रही थी कि आईएम गुट के साथ जल्दी ही शांति-समझौता हो जाएगा, लेकिन सत्ताधारी नगा नेशनल फ्रंट आईएम गुट को यह विश्वास दिलवाने में सफल रहा कि उनकी सरकार फिर से बनने पर उनके लिए राहत होगी। बांग्लादेश की सीमा से सटे त्रिपुरा में एनएलएफटी और एटीटीएफ नामक दो संगठनों की तूती बोलती है। रंजीत देब वर्मन द्वारा गठित आल त्रिपुरा टाईगर फोर्स के पास 50 एक राईफलें व 200लड़ाके हैं तो नयबंसी जमातिया के संगठन नेशनल लिबरेशन फोर्स ऑफ त्रिपुरा के 150 समर्पित उग्रवादी भी अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं। इन दोनों संगठनों के मुख्यालय, ट्रेनिंग कैंप और छिपने के ठिकाने बांग्लादेश में हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन संगठनों को उकसाने व मदद करने का काम हुजी व हरकत उल अंसार जैसे संगठन करते हैं।

छोटे राज्य मणिपुर में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह पीएलए, यूएनएलएफ और पीआरईपीएके जैसे संगठनों का गुलाम हैं। यहां सरकारी कर्मचारियों को अपने वेतन का एक हिस्सा आतंकवादियों को देना ही होता है। बाहरी लोगों की यहां खैर नहीं है। केवाईकेएल यानि कांग्लेई यावोल कन्न ललुप संगठन भी राज्य के पहाड़ी इलाकों में सक्रिय है। बीते दस सालों के दौरान यहां पांच हजार से ज्यादा लोग अलगाववाद के शिकार हो चुके हैं। इसके अलावा नगा-कुकी तथा कुकी-जोमियो संघर्ष में सात सौ से ज्यादा जानें गई हैं। यहां सबसे ज्यादा ताकतवर संगठन यूनाईटेड नेशनलिस्ट लिबरेशन फ्रंट है जिसके पास 1500 लोग हैं। दूसरे सबसे खतरनाक संगठन पीपुल लिबरेशन आर्मी में 400 के करीब लड़के हैं ये सभी संगठन अत्याधुनिक हथियारों व संचार उपकरणों से लैस हैं। मेघालय में एएनयूसी और एचएनएलएल नामक संगठन अलगाववाद के झंडाबरदार हैं वहीं मिजोरम में एनपीसी और बीएनएलएफ राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग हैं। इसके अलावा असम को आधार बना कर कई गुमनाम संगठन भी अलगाववाद की रट लगाए हैं, इनमें से कई सीधे-सीधे पाकिस्तानी आईएसआई की पैदाईश है। असम में छोटे-बड़े 36 आतंकवादी संगठनों का अस्तित्व सरकारी रिकार्ड स्वीकार करता है। मणिपुर में 39, मेघालय में पांच, मिजोरम में दो, नगालैंड में तीन, त्रिपुरा में 30 और अरूणाचल प्रदेश में महज एक अलगवावादी संगठन है। इनमें से अधिकांश को पाकिस्तान से बांग्लादेश में बने बेस कैंप से खाद-पानी मिलता है, ऐसे कुछ संगठन हैं - डिमा हालिम डाओगा (डीएचडी), कार्बी लांग्री नेशनल लिबरेशन फ्रंट (केएलएनएलएफ), कार्बी नेशनल वॉलियंटर्स (केएनवी), राभा नेशनल सिक्योरिटी फोर्स (आएनएसएनफ), कोच राजवंशी लिबरेशन आर्गनाइजेशन (केआरएलओ), हमार पीपुल्स कोन्वेशन (एचपीसी-डी), कार्बी पीपुल्स फ्रंट (केपीएफ), तिवा नेशनल रिवोल्यूशनरी फोर्स (टीएनआरएफ), बिरसा कमांडो फोर्स (बीसीएफ), बंगाली टाइगर फोर्स (बीटीएफ), आदिवासी टाइगर फोर्स (एटीएफ), आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी ऑफ असम (आनला), गोरखा टाइगर फोर्स (जीटीएफ), बराक वेली यूथ लिबरेशन फ्रंट (बीवीवाइएलएफ), युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ बराक वेली, मुस्लिम युनाइटेड लिबरेशन टाइगर्स ऑफ असम (मुल्टा), मुस्लिम युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (मुल्फा), मुस्लिम सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ असम (एमएससीएफ), युनाइटेड लिबरेशन मिलिशिया ऑफ असम (उल्मा), इस्लामिक आदि। ये सभी संगठन उत्तर-पूर्व के अन्य राजयों में सक्रिय अवैध संगठनों के नेटवर्क में रहते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला, वसूली आदि के लिए एक-दूसरे को हथियार व आदमियों की मदद करते हैं।

आंकड़े गवाह हैं कि सन 2009 से 2011 के बीच इन राज्यों में क्रमशः 531, 237 और 114 आतंकवादी मारे गए। वहीं सन 2009 में 44 सुरक्षाकर्मी,  2010 में 28 और 2011 में 32 सुरक्षा बल के लोग शहीद हुए। इन सालों में मारे गए आम लोग क्रमशः 264, 94 और 70 हैं। यदि इन्हीं सालों में कश्मीर के आंकड़े देखें तो 2009 में 71 आम लोग, 2010 में 47 और 2011 में 31 लोग मारे गए। जबकि सुरक्षा बलों की मौत के आंकडे क्रमशः 79, 69 और 33 हैं। साफ जाहिर है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत से संगठन सक्रिय हैं और वहां उग्रवाद कश्मीर से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद श्रीनगर में हथगोला फटने की खबर टीवी व अखबारों पर पहली सचित्र होती है, जबकि उत्तर-पूर्व के भीषण नरसंहार बामुश्किल जगह पाते हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि बांग्लादेश से लगी सीमा के 4096.7 किलोमीटर पर भारत सरकार पहले ही कंटीले तारों की बाड़ लगा चुकी हैं, जबकि म्यांमार से सटी सीमा पर 1643 किलामीटर पर गहरी खाई हैं। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल आदि के हजारों जवान भी लगे हैं। साफ जाहिर है कि इन राज्यों में आतंकवादियों को सीमा पार आने के लिए सीमा से आंख चुरा कर आने की जरूरत नहीं पड़ती है। वे कई बार फर्जी पासपोर्ट या अन्य जरियों से भीतर आते व जाते रहते हैं।

अनूप चेतिया और परेश बरूआ के मामले में सामने आ चुका है कि इन लोगों ने बैंकाक और ढाका में पांच सितारा होटल से ले कर जहाज कंपनी तक के व्यापार विधिवत, खोल रखे हैं। यह तथ्य भारत सरकार की खुफिया एजेंसियों को कई साल पहले पता था कि बांग्लादेश का काक्स बाजार बंदरगाह हथियारों के सौदागरों का प्रमुख अड्डा बना हुआ है और वहां पहुंचने के लिए अंडमान सागर का इस्तेमाल किया जाता है। एक अमेरिकी खुफिया रपट बताती है कि गोल्डन ट्राईंगल से म्यामार के रास्ते हथियारों के बदले नशीली दवाओं के व्यापार पर भारत सरकार ना जाने क्यों कड़ी कार्यवाही करने से बचती है। यह वही जगह है जहां से श्रीलंका में खून खराबे के दिनो में लिट्टे तक हथियारों की खेप पहुंचती थी।

जिस तरह से उत्तर-पूर्वी राज्यों के उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों तथा उसके लिए जरूरी गोला-बारूद से लैस रहते हैं इससे यह तो साफ है कि कोई तो है जो दक्षिण-पूर्व एशिया में अवैध संवेदनशील हथियारों की खपत बनाए रखे हुए है। बंदूक के बल पर लोकतंत्र को गुलाम बनाने वालों को हथियार की सप्लाई म्यांमार, थाईलैंड, भूटान, बांग्लादेश से हो रही है। मणिपुर, जहां सबसे ज्यादा उग्रवाद है, नशे की लत से बेहाल और उससे उपजे एड्स के लिए देश का सबसे खतरनाक राज्य कहा जाता है। कहना गलत ना होगा कि यहां नारकोटिक्स व्यापर के बदले हथियार की खेप पर कड़ी नजर रखना जरूरी है।

यह दुर्भाग्य है कि दिल्ली में बैठे लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों को सतही दूरी ही नहीं, बल्कि दिलों से भी दूर मानते रहे हैं। इस बात की बानगी है पिछले दिनों वहां के तीन राज्यों में संपन्न विधनसभा चुनाव। वहां के चुनाव परिणाम आए तो दिल्ली के किसी भी हिंदी चैनल पर नतीजों की खबर गायब थी, कारण- उस दिन आम बजट आ रहा था। यह बात हमारी मानसिकता को उजागर करती है कि हम उन कोई 200 विधानसभा सीटों के मतदाताओं की भावनाओं से अपना तारतम्य ही नहीं स्थापित कर पाए हैं। आज वहां के हालात इस मुकाम पर पहुंच गए है कि अलगाववादी कदमों पर काबू नहीं किया गया तो पृथकतावादियों पर नियंत्रण करना असंभव हो जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।)