नाेटबंदी: दिल्ली की फैक्ट्रियाें में ताला- मजदूर काम छाेड़ कर जा रहे हैं

नाेटबंदी के कारण दिल्ली के कपड़ों के कारखानों में ताला लग रहें हैं, गरीब मजदूर काम छाेड़ कर अपने घर काे लाैट रहें हैं।

नाेटबंदी: दिल्ली की फैक्ट्रियाें में ताला- मजदूर काम छाेड़ कर जा रहे हैं

असरथ जो शीलमपूर स्थित कपड़े के कारखाने में काम करता है उसने नारदा न्यूज को बताया कि वह मुरादाबाद अपने माता पिता के पास हर महिने अपने घर 8000 रुपए भेजता था। उसका परिवार इसी पर निर्भर था। उसने टिप्पणी करते हुए कहा कि पीएम मोदी और उनके नोटबंदी को धन्यवाद जिससे वह अपने घर पैसे नहीं भेज सकेगा।

असरथ ने हमें आगे बताया कि वह एक छोटे कपड़े कारखाने में काम करता है जहां पर जीन्स बनाई जाती है। उसके परिवार में 7 भाई बहन हैं। उसके पिता कर्जदार भूमीहीन किसान हैं उसके परिवार में वही एक  है जो काम करके अपने परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। 19 वर्षीय असरथ से जब हम फैक्ट्री में मिले तब उसके पास कुछ ही दिन बचे हुए थे दिल्ली में रहने के लिए। उस फैक्ट्री में 25 लाेग आैर थे जाे असरथ के साथ काम करते थे। आज वह फैक्ट्री बेजान कब्रिस्तान की तरह दिख रहा था। जब हम वहां पर पहुंचे तब वहां पर केवल दाे ही लाेग बचे हुए थे। उन दाेनाे ने हमे बताया कि वे दाेनाे भी दाे दिनाें के बाद अपने घर जाने वाले हैं।





असरथ अपने जेसे उन 10,000 लाेगाें के प्रतिनिधि हैं जाे बड़ी संख्या में घराें काे छाेड़कर दिल्ली में कपड़ाें के कारखाने में मजदूर के हेशियत से काम कर रहे थे। जाे अब अपने गांव घर काे वापस लाेट रहे हैं। पूर्वी दिल्ली में स्थित वस्त्र उद्योग काे इस नाेटबंदी के फैसले के कारण काफी नुकसान हुआ है। भारत में पीएम मोदी के बहुचर्चित निर्माता परियोजना मेक इन इंडिया जाे की छोटे और मध्यम कारखानों काे एक दैनिक आधार पर बंद करने के साथ- साथ एक क्रूर मजाक भी किया जा रहा है।





असरथ ने हमें बताया कि वह रात 9 बजे तक काम करता है, उसकी मजदूरी उसके काम की मात्रा पर आधारित मिलती है। उसने आगे कहा कि मुझे ज्यादा मेहनत इस लिए करना पड़ता है क्याेंकि वह महिने में 10,000 से 12,000 तक कमा सके। कमरे का किराया वह बचा लेता है क्याेंकि फैक्ट्री के मालिक ने उसे कारखाने में साेने के लिए इज्जाजत दे रखी है। नाेटबंदी के बाद दाे दिनाें तक असरथ भूखे रहा था क्याेंकि उसके पास पुराने 500 के नाेट पड़े हुए थे आैर पुराने नाेट दुकानदाराें ने लेना बंद कर दिया था। उसी दाैरान एक व्यक्ति जाे पुराने नाेट के बदले नए नाेट दे रहा था लेकिन 100 - 150 रुपए का कमिशन पर। असरथ ने कहा की वह हमारे सौदेबाजी की शक्ति पर निर्भर करता था की हम कितना ताेल माेल कर सकतें हैं।



पीएम मोदी कहतें हैं कि अगर हम जैसे गरीब मजदूर उनका साथ देंगे तो वह देश में काला धन और भ्रष्टाचार को कम करेंगे। हमने असरथ से पुछा की आपको लगता है कि डिजिटल नकदी के माध्यम से एक कैशलेस अर्थव्यवस्था की मोदी के सपने को भ्रष्टाचार से लड़ने में मदद मिलेगी? इस विषय पर हमारे फोटो एडिटर विजय पांडे ने असरथ काे समझाया कि  डिजिटल नकदी बकवास है। असरथ ने हमसे मासूमियत से पूछा कि हमे डिजिटल नकदी के लिए पढ़ना आैर लिखना दाेनाे बहुत जरुरी है। असरथ उन लाखाें लाेगाें में से है जाे कभी स्कूल नहीं गया आैर ना ही पढ़ना आैर लिखना जानता है। वस्त्र कारखानाें में अधिकांश वही लाेग काम करते हैं जाे पढ़ना लिखना बिल्कूल भी नहीं जानते हैं। असरथ ने बताया कि वह बचपन से ही काम कर रहा हैं। वह मुरादाबाद में दर्जी का काम किया करता था उसके बाद दिल्ली में सिफ्ट हाे गया।



सरवर जाे की ठीक असरथ के पास में ही स्थित कपड़ों के कारखाने में काम करता है। जाे कि बिहार के कटिहार जिला का रहने वाला है। सरवर अब 18 साल का हाे गया है दिल्ली आने से पहले वह कई जगहाें पर काम कर चुका है। नारदा न्यूज से बात करते हुए सरवर ने बताया कि नाेटबंदी के बाद से वह दिन भर में एक ही बार खाना खाता हैं। जब हमने पुछा कि तुम अपने घर क्याे नहीं चले जाते हाे तब उसने हमें बताया कि उसका परिवार काफी बड़ा है आैर उसके पिता भी भूमिहीन किसान है।

नाटबंदी के फैसले के बाद भले माेदी आैर माेदी के सहयाेगी फैसले पर अपनी पीठ थपथपा रहें हैं। लेकिन ये अकथनीय हैं आैर कड़वी भी हैं। जहां भारत सरकार अपनी बाहबाही लूट रही हैं वहीं गरीब मजदूर जाे कपड़ाे के कारखानाें में काम करते हैं उन्हें आज एक एक रुपए के लिए माेहताज हाेना पड़ रहा है। मीडिया से मिल रही जानकारी के मुताबिक अब तक दिल्ली शहर के कारखानाें में 4 लाख से ज्यादा लाेगाें ने अपनी नाेकरी काे गवा दी।

बतांदें की 500 आैर 1000 के पुराने नाेट जाे कि देश के कुल मुद्रा में से 86 प्रतिशत था। उसकी भरपाई करने के लिए माेदी ने 50 दिनाे का समय जरुर लिया है मगर बैंकाें  आैर एटीएम के बाहर लंबी कताराें काे देख कर नहीं लगता है कि पीएम माेदी 50 दिनाें के अंदर समस्या का समाधान कर सकेंगे। बताया जा रहा है कि देश में नाेटबंदी के कारण अब तक 97 लाेगाें की माैत हाे गई है। नाेटबंदी के कारण संसद की शीतकालीन सत्र भी हंगामे की भेंट चड़ गई। इसमें कोई दोराय नहीं कि जनता नाेटबंदी काे कभी भूल पाएगी।  मगर वह मजदूर जाे अपनी रोजी-रोटी का जरिया खाे चुके हैं वे और उनके परिवार इस नाेटबंदी काे कभी नहीं भूलेंगे।