नहीं रहे मशहूर शायार बेकल उत्साही...

नहीं रहे 88 वर्षीय मशहूर शायर बेकल उत्साही, दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में ली आखिरी सांस...

नहीं रहे मशहूर शायार बेकल उत्साही...

राज्यसभा के पूर्व सदस्य एवं मशहूर शायर मोहम्मद शफी खान बेकल उत्साही का दिल्ली के आज राम मनोहर लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। बेकल उत्साही के परिवार में दो बेटे और चार बेटियां है। मस्तिष्काघात के कारण गुरुवार को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

स्थानीय भाषा के मिश्रण से उन्होंने गज़ल एवं शेरो शायरी में कई प्रयोग किए जो श्रोताओं ने खूब पसंद किया। गंगा जमुनी संस्कृति के समर्थक को साहित्यिक सेवाओं में विशेष योगदान के लिए 1976 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था। कांग्रेस ने बेकल उत्साही को 1986 में राज्यसभा का सांसद बनाया था।

पद्मश्री बेकल उत्साही की ये पक्तियां उन्हें जन्म जन्मान्तर तक जिंदा रखेंगी। शेरो शायरी में गंगा जमुनी तहज़ीब का जैसे सूर्य अस्त हो गया। एक नए परम्परा के जन्मदाता पद्मश्री बेकल उत्साही ने उर्दू व हिन्दी भाषा को पूरा सम्मान दिया। स्थानीय भाषा के मिश्रण से उन्होंने गज़ल व शेरो शायरी में कई प्रयोग किए जो श्रोताओं के सिर चढ़कर बोला।

पद्मश्री बेकल उत्साही का जन्म एक जून 1928 को ग्राम रमवापुर, उतरौला में जमींदार पिता लोदी मोहम्मद शफी खान के यहां हुआ था। माता का नाम बिस्मिल्लाह बीबी था। बेकल का असली नाम शफी खान है और गांव के लोग प्यास से इन्हें भुल्लन भैया कहकर पुकारते थे। सदा भीड़-भाड़ में रहने वाले बेकल उत्साही को अकेलापन पसंद था।

गुलामी के दौर में बेकल अंग्रेज हुक्मरानों के खिलाफ जवानी में राजनीतिक नज़्म व गीत लिखने लगे। अंग्रेजों को यह हरकत नागवार गुजरी और बेकल को कई बार जेल जाना पड़ा। जेल से ही उन्होंने नातिया शायरी की शुरुआत की। बेकल ने साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता के लिए हिन्दी और उर्दू भाषा को आपस में मिलाकर एक नई शैली प्रदान की। जिसे बेकल शैली कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

उन्होंने 1952 में विजय बिगुल कौमी गीत, 1953 में बेकल रसिया लिखी। इसके बाद उन्होंने गोण्डा हलचल प्रेस, नगमा व तरन्नुम, निशात-ए-जिन्दगी, नूरे यजदां, लहके बगिया महके गीत, पुरवईयां, कोमल मुखड़े बेकल गीत, अपनी धरती चांद का दर्पण जैसी कई किताबें लिखीं।

उनके गंगा जमुनी संस्कृति का मिश्रण एवं साहित्यिक सेवाओं में विशेष योगदान से प्रभावित होकर 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पद्मश्री बेकल उत्साही को कांग्रेस ने अपने कोटे से 1986 में राज्यसभा भेजा।