भारत नए नोट तो स्कैंडेनेवियाई देश स्वीडन कचरे की किल्लत परेशान, दूसरे देशों से करना पड़ रहा है आयात

जिस तरह भारत को नोटबंदी के बाद नए नोटों के लिए परेशान होना पड़ रहा है तो उसी तरह स्कैंडिनेवियाई देश स्वीडन को कचरे की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है...

भारत नए नोट तो स्कैंडेनेवियाई देश स्वीडन कचरे की किल्लत परेशान, दूसरे देशों से करना पड़ रहा है आयात

भारत में जब से 500, 1000 के नोट बंद किए गए हैं। तभी से लोगों को नकदी में नए नोटों की किल्लत से झूझना पड़ रहा है। जिस तरह भारत नोटबंदी के बाद नए नोटों के लिए परेशान है उसी तरह स्कैंडिनेवियाई देश स्वीडन को कचरे की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। कचरे का आलम यह है कि इस देश को कूड़ा दूसरे देशों से आयात करना पड़ रहा है। बता दें कि दुनिया भर में 10 टॉप के कैशलेस अर्थव्यवस्था वाले देशों में स्वीडन चौथे स्थान पर है।

बता दें कि स्कैंडेनेवियाई देश स्वीडन में  कचरे की किल्लत इतनी बढ़ गई है कि बेहतरीन रिसाइकलिंग प्लांटों को संचालित करने के लिए दूसरे देशों से कचरे का आयात करना पड़ रहा है। अपनी जरूरत की करीब आधी बिजली नवीकरणीय पदार्थों से पैदा करने वाला स्वीडन साल 1991 में जीवाश्म ईंधनों पर भारी टैक्स लगाने वाले देशों में भी शामिल है। उसका रिसाइकलिंग तंत्र इतना अधिक सक्षम है कि पिछले साल वहां के घरों से निकलने वाले एक फीसदी से कम कचरों को जमीन में दबाने की जरूरत पड़ी थी।

वहीं इस देश को दूसरे देशों से ज्यादा से ज्यादा कचरा आयात करने और उसे जलाने का अधिकार मिला हुआ है। कचरों से बनने वाली नवीकरण ऊर्जा का इस्तेमाल राष्ट्रीय ऊष्मा तंत्र में प्रयोग किया जाता है। इसका इस्तेमाल ज्यादा ठंड के वक्त घरों को गर्म करने के लिए किया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि स्वीडन के निवासियों में घरों से निकलने वाले कचरों को पुनर्चक्रण के लिए संरक्षित करने की प्रवृत्ति सालों तक चलाये गये जागरूकता अभियान के तहत पैदा हुई है।

गौरतलब है कि भारत में कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और कालेधन को बाहर निकालने के लिए देशवासियों को 50 दिन का वक्त दिया गया है। इन 50 दिनों में ही कैशलेस लेन-देन को तेज करने की कोशिश में ही सरकार जूटी हुई है।  भारत सरकार द्वारा 8 नवंबर को  500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बंद होने से देश के बैंक और यहां के निवासी नकदी के रूप में नये 500 और 2000 रुपये के नोटों की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं। हालांकि, सरकार और केंद्रीय भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से लगातार स्थिति में सुधार आने के दावे किये जा रहे हैं, लेकिन नकदी के संकट में सुधार की रफ्तार में तेजी नहीं आ रही है।

देश-विदेश की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के फैसले से पहले तक भारत की करीब 72 फीसदी आबादी इंटरनेट की पहुंच से बाहर है। देश के शहरी और ग्रामीण इलाकों के करीब 28 फीसदी आबादी ही ऐसी है, जो किसी न किसी रूप में स्मार्टफोन और अन्य माध्यमों से इंटरनेट से जुड़ी हुई है। दूसरी बात यह कि सरकार ने कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के पहले देश के लोगों को जागरूक करने की दिशा में अभियान भी ठीक ढंग से नहीं चला पायी है।

प्रधानमंत्री के नोटबंदी फैसले से ज्यादातर दिक्कत ग्रामीण क्षेत्रों को लोगों को हो रही है। गांव के लोगों को कैशलेस के बारे में जानकारी ना के बराबर है और शहर के लोगों के पास अगर इसकी जानकारी है भी तो उन्हें बैंक के रवैये और काम की ढिलाई की वजह से कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही लोगों को भारी नकदी के संकट से भी झूझना पड़ रहा है।