मुस्लिम दलों पर भरोसा नहीं करते यूपी के मुसलमान

नरेन्द्र कुमार वर्मा,उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से पहले तमाम दल राज्य के मुसलमानों को लुभाने में जुटे है। मगर राज्य के मुसलमान मुस्लिम राजनीतिक ...

मुस्लिम दलों पर भरोसा नहीं करते यूपी के मुसलमान

नरेन्द्र कुमार वर्मा,

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से पहले तमाम दल राज्य के मुसलमानों को लुभाने में जुटे है। मगर राज्य के मुसलमान मुस्लिम राजनीतिक दलों पर विश्वास नहीं करते...

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलीमीन (एआइएमआइएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने घोषणा की है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी पूरे दम खम के साथ शिरकत करेगी। इत्तेहाद-ए-मिल्लत कोंसिल, मुस्लिम मजलिस, परचम पार्टी, पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया, इंडियन नेशनल लीग और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे राजनीतिक दलों का दावा हैं कि उनकी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों पर अच्छी खासी पक़़ड़ है। मगर वास्तव में ये सभी दल मुसलमानों के बीच तो निष्प्रभावी है ही साथ ही राज्य की राजनीति में भी उनका कोई वजूद नहीं है।

2008 में वजूद में आई डॉक्टर अयूब अंसारी की पीस पार्टी ने साल 2012 के विधानसभा चुनावों में चार जगहों पर जीत दर्ज कर अपनी आमद कराई थी। मगर जमाते-ए- इस्लामी हिंद की अगुवाई में बनी वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया जैसी राजनीतिक पार्टी प्रदेश में दमखम दिखाने में नाकाम रही।

राज्य के मुसलमानों के बारे में यह आम धारणा हैं कि वे मौलानाओं और उलेमाओं के फतवों से वोट डालते है। जबकि यह कोरी अफवाह है। हकीकत में मुस्लिम धर्मगुरुओं की अपील का मुस्लिमों पर कोई असर नहीं होता। उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोटर बहुत समझदार, जागरुक और बुध्दिमान है उन्होंने कभी भी दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैय्यद अहमद बुखारी के फरमान को तवज्जों नहीं दी।  साल 2007 में जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी ने यूडीएफ नाम से मोर्चा बना कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 54 मुस्लिम बहुल सीटों अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनकी जमानत भी नहीं बची। 2012 में दो दर्जन मुस्लिम दलों के इत्तेहाद फ्रंट को भी सूबे के मुसलमानों के नाकार दिया था।

दरअसल उत्तर प्रदेश के मुसलमान कट्टर मुस्लिम छवि वाले किसी भी राजनीतिक दल से परहेज करते हैं। मुस्लिमों की रहनुमाई का दावा करने वाले दलों को छोड़ कर वे सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे सेक्युलर दलों के साथ जाना पसंद करते हैं। राज्य में मुस्लिम वोटरों की संख्या 18 फीसदी है। 403 विधानसभा क्षेत्रों में से दो से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मत निर्णायक भूमिका निभाते है। प्रदेश का आम मुसलमान मुस्लिम नाम वाली पार्टियों के बहकावे में नहीं आता बल्कि बहुत सोच समझ कर अपने मत का इस्तेमाल करता है।

उत्तर प्रदेश के मुस्लिम तबके में बीते तीन दशक के अंदर बहुत बड़ी राजनीतिक जागरुकता पैदा हुई है। उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य सपा, बसपा और कांग्रेस में सुरक्षित दिखाई देता है न कि राजनीतिक उझलकूद मचाने वाले अपने सियासी दलों में। राज्य के मुसलमानों को आजम खां, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, जफर अली नकवी, मुनकाद अली, शाहिद मंजूर और अबु आजमी से ज्यादा मुलायम सिंह यादव, मायावती और राहुल गांधी पर भरोसा दिखाई देता है। मुसलमान सपा, बसपा और कांग्रेस में से अपने विकल्प का चुनाव करते हैं।

मौजूदा वक्त में बसपा ने अब तक 130 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। सपा भी 100 से ज्यादा मुसलमानों को चुनाव में उतारने का दावा कर रही है। कांग्रेस ने भी इस बात के संकेत दिए हैं कि पढ़े लिखे मुस्लिम युवाओं को विधानसभा चुनावों में उतारा जाएगा। अपने दलों से लगातार राजनीतिक वादा खिलाफी को झेलने वाले राज्य के मुसलमानों को अब इस बात का अहसास हो चुका है कि उनके वोट का सच्चा हकदार कौन है। इस बात से कोई इनकार नहीं किया जा सकता कि सपा, बसपा और कांग्रेस की सियासी जमीन मुसलमानों पर टिकी है। तीनों दल इस प्रयास में जुटे हैं कि किसी भी तरह मुसलमान उनके साथ आ जाएं।