जयललिता जैसा कोई नहीं, पर कैसी होगी सियासी तस्वीर ?  

छह बार तमिलनाडु की सीएम रहीं जयललिता के निधन के बाद अहम सवाल ये है कि राज्य की सियासत क्या करवट लेगी? ओ. पन्नीरसेल्वम नए सीएम बन गए हैं, लेकिन माना जा रहा है कि 44 साल पुरानी AIADMK की कमान जयललिता की खास सलाहकार रहीं शशिकला के ही हाथों में होगी। दरअसल, जयललिता के रहते पूरी राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द सिमटी रही। पार्टी में कभी सेकंड लाइन बनी ही नहीं। खुद जयललिता ने भी इसके लिए खास कोशिश नहीं की। अब पार्टी टूटने का डर है।

जयललिता जैसा कोई नहीं, पर कैसी होगी सियासी तस्वीर ?  

पहले एमजीआर, फिर जयललिता। अब तीसरा कौन? ओ. पनीरसेल्वम फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। जबकि पार्टी की कमान जयललिता की करीबी रहीं शशिकला नटराजन के हाथों में जा सकती है। मगर दोनों में ही एमजी रामचंद्रन या जयललिता जैसा जादू बिखेरने की क्षमता फिलहाल नहीं दिख रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि जयललिता और पार्टी का उत्तराधिकारी कौन होगा? उधर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही वेट एंड वॉच मोड में है। जैसे ही कोई संभावना दिखी फटाफट लपकने की तैयारी है। छह बार तमिलनाडु की सीएम रहीं जयललिता के निधन के बाद अहम सवाल ये है कि राज्य की सियासत क्या करवट लेगी?  ओ. पन्नीरसेल्वम नए सीएम बन गए हैं, लेकिन माना जा रहा है कि 44 साल पुरानी AIADMK की कमान जयललिता की खास सलाहकार रहीं शशिकला के ही हाथों में होगी। दरअसल, जयललिता के रहते पूरी राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द सिमटी रही। पार्टी में कभी सेकंड लाइन बनी ही नहीं। खुद जयललिता ने भी इसके लिए खास कोशिश नहीं की। अब पार्टी टूटने का डर है। हालांकि, पन्नीरसेल्वम को शशिकला के वफादारों में गिना जाता है।पन्नीरसेल्वम को 2 बार सीएम बनवाने में शशिकला का ही हाथ है।

ऐसी हो सकती है सियासी तस्वीर

पन्नीरसेल्वम सीएम बन गए हैं, लेकिन एआईएडीएमके का नेतृत्व उनके हाथ में नहीं होगा।

पार्टी की कमान जयललिता की खास सलाहकार रहीं शशिकला संभाल सकती हैं।

टेन्योर पूरा करना नए CM पन्नीरसेल्वम के लिए बड़ी चुनौती

पन्नीरसेल्वम के लिए टेन्योर पूरा करना बड़ी चुनौती है। वे जया के करीबी थे, लेकिन कई विधायक उन्हें अपना नेता नहीं मानते हैं ।

सरकार का करीब 4 साल का टेन्योर बाकी है। ऐसे में संभव है कि कुछ समय बाद विद्रोह पनपे।

अगर पार्टी में विद्रोह जैसे हालात पैदा हुए तो शशिकला भारी पड़ेगी

पार्टी के अंदर शशिकला के वफादारों की बड़ी तादाद है।

पार्टी में वर्चस्व को लेकर पन्नीरसेल्वम और शशिकला के बीच विवाद भी शुरू हो सकता है।

वैसे, कहा जा रहा है कि पन्नीरसेल्वम सीएम बने रहेंगे, लेकिन सारे अहम फैसले शशिकला ही लेंगी।

एआईएडीएमके के टुटने का डर

शशिकला कभी एक्टिव पॉलिटिक्स में नहीं रहीं। उन्होंने जया के पीछे रहकर ही काम किया।

एआईएडीएमके में दबदबे को लेकर पन्नीरसेल्वम के साथ उनके मतभेद भी पैदा हो सकते हैं।

ना शशिकला और ना ही पन्नीरसेल्वर इतने काबिल हैं कि पार्टी को एकजुट रख सकें।

1987 में एमजीआर की मौत के बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट गई थी। तब जयललिता से नफरत करने वालों ने एमजीआर की वाइफ जानकी को सीएम बनवा दिया था। 29 साल बाद अब पार्टी के टूटने का डर है।

बीजेपी-कांग्रेस नया विकल्प बन सकती हैं?

49 वर्षों से राज्य में सिर्फ दो ही पार्टी एआईएडीएमके और डीएमके की सरकार रही है।

बीजेपी और कांग्रेस जैसी नेशनल पार्टियों का राज्य में कोई वजूद नहीं रहा है।

अब जयललिता रही नहीं। करुणानिधि भी 92 साल के हैं। ऐसे में, बीजेपी और कांग्रेस राज्य में अपनी जमीन मजबूत करना चाहेंगे।

जया की पार्टी के नेताओं पर दोनों दलों की नजरें होंगी। एआईएडीएमके में लीडरशिप न होने से उसके वोटर्स बीजेपी-कांग्रेस की ओर जा सकते हैं।

गैर-द्रविड़ पार्टियां जया के निधन से पैदा हुई राजनीतिक शून्यता का फायदा उठा सकती हैं।

डीएमके रखे पेशेंस तो होगा सकता है फायदा ?

92 साल के करुणानिधि की खराब सेहत के चलते उनके बेटे एमके स्टालिन पार्टी को संभाल रहे हैं।

अगर डीएमके ने जल्दबाजी करते हुए एआईएडीएमके को तोड़ने की कोशिश की, तो उसे नुकसान हो सकता है।

लेकिन अगर करुणानिधि ने थोड़ा पेशेंस से काम लिया तो उन्हें फायदा होने के आसार भी हैं।

तमिलनाडु विधानसभा की तस्वीर

कुल सीट- 234

एआईएडीएमक- 136

डीएमके- 89

कांग्रेस- 8

आईयूनएमएल- 1

लोकसभा में संख्या के लिहाज से तीसरे नंबर पर है एआईएडीएमके

बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर हैं लोकसभा में एआईएडीएमके के सांसद।

लोकसभा में एआईएडीएमके के 37 सांसद हैं ।

राज्यसभा में एआईएडीएमके के 11 सांसद हैं ।

जयललिता अब इस दुनिया में नहीं रहीं. लेकिन, उनके जाने के बाद का खालीपन न केवल उनके चाहने वालों के लिए परेशान करने वाला है, बल्कि यह दूसरे सियासी दलों के लिए भी खालीपन का एहसास कराने वाला है। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहते हुए जयललिता के मौजूदा केन्द्र सरकार के साथ रिश्ते बेहतर थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भी उनके संबंध बेहतर रहे हैं. मौजूदा दौर में जब विपक्षी दलों की तरफ से सरकार को हर मोर्चे पर लगातार घेरा जा रहा था, तब कई मौकों पर सरकार को जया का साथ मिला था।लेकिन हाल ही में जीएसटी को लेकर केन्द्र के साथ राज्य की तल्खी देखने को मिली थी. ऐसे में अब जयललिता के बाद के दौर में केन्द्र और राज्य के रिश्तों को लेकर अटकलें लगने लगी हैं।