कड़ाके की ठंड में फ्लाई आेवर के नीचे रहने काे मजबूर गरीब

दिल्ली के फ्लाई आेवर या बस स्टाॅप में रात गुजारने को मजबूर गरीब, कड़ाके की ठंड में ये लाेग अपने मासूम बच्चाें आैर महिलाआें के साथ रह कर दिन रात गुजारते हैं और इस जानलेवा ठंड को झेलते हैं।

कड़ाके की ठंड में फ्लाई आेवर के नीचे रहने काे मजबूर गरीब

देश की राजधानी नई दिल्ली जहां एक तरफ है आसमान काे छुते हुए इमारत हैं, जहां पर अमीर से अमीर लाेग रहते हैं, वहीं दुसरी आेर है झुग्गी झाेपड़ी जिसमें मजदूर वर्ग के लाेखाें लाेग अपनी जीवन निर्वाह कर रहे हैं। मगर इसी दिल्ली में एक आैर तबका रहता है जिन्हें सरकारी योजनाओं  से वंचित हैं। जिनके पास न तो आलिशान महल है आैर न ही सिर छुपाने के लिए छत है।



हम उन लाेगाें की बात कर रहे हैं जाे अपना गुजारा सड़क पर करते हैं। इनके पास न ही सोने के लिए बिस्तर है और न ही रहने को घर। ये लाेग सड़क पर रहते हैं आैर अपना गुजर बसर सब खुले आसमान में करते है।

दिसंबर के कड़ाके की ठंड इन लोगों के लिए चुनौतियों से भरा है।  सर्दी के अलावा  प्रदुषण आैर धूंध भी इन बेघर लाेगाें के लिए एक श्राप जैसा मालूम पड़ता है। यह लाेग मजबूर हैं ठिठुराने वाली सर्दी में सोने के लिए।







दिल्ली सरकार ने बेघर लाेगाें के लिए राजधानी में  रैन बसेरा का इंतजाम किया था, दिल्ली सरकार का दावा है कि उन्हाेने बैघर लाेगाें काे पुनर्वास करने के लिए अब तक 218 रैन बसेरे का निर्माण किया है। जिसमें 17000 लाेगाें काे रखने कि क्षमता है मतलब एक रैन बसेरा में 78 लाेगाें काे रखने की जगह दी गई है। इस रैन बसेरों में पानी सहित शौचालय भी की सुविधाएं उपलब्ध है। रेलवे और बस स्टैंडों में रहकर जीवन यापन करने वाले बेघर लोगों को रहने के लिए एक ठिकाना मिल सके इसके लिए राज्य सरकार ने करीब साल भर पहले जिला मुख्यालय में रैन बसेरा खोलने की घोषणा की थी। लेकिन जमीन नहीं मिलने के कारण रैन बसेरा का निर्माण अधर में लटक गया है। सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के अनुसार शहरी बेघरों के आश्रय के लिए नगरीय निकायों में महानगरों की तरह रैन बसेरा बनाया जाना है।



फ्लाई आेवर के नीचे रात गुजारने को मजबूर



दिल्ली में एेसे बहुत से गरीब लाेग हैं जिनके पास रहने के लिए एक झाेपड़ी तक नहीं है। ये लाेग फ्लाई आेवर के नीचे या बस स्टाॅप पर अपने मासूम बच्चाें आैर महिलाआें के साथ रह कर दिन रात गुजारते हुए कड़ाके की सर्दी काे झेलते हैं। इन्ही लाेगाें की समस्याआें काे उजागर करने के लिए हमने सराय काले खां आैर मुनिरका जैसे इलाके का रूख किया। वहां ये लोग बड़ी संख्या में फ्लाई आेवर, बस स्टाॅप आैर शेल्टर में रहते हैं।



मुनिरका की फ्लाई आेवर के नीचे अपने परिवार के साथ रहने वाले व्यक्ति माम चंद सिंह से बात करने पर उसने बताया कि वह पिछले 20 सालाें से अपने परिवार के साथ दिल्ली में गुजर बसर कर रहा हैं। उसने हमें बताया कि वह अपने परिवार के साथ मुनिरका में झुग्गी में रहता था। 2012 में सरकार के आदेश के बाद उन्की झुग्गियाें काे ताेड़ दिया गया था। तब से वह अपने परिवार के साथ मुनिरका फलाई आेवर में अपना गुजर बसर कर रहा है। जब हमने पुछा कि वह रैन बसेरा में क्याें नहीं रह रहा है। तब उसने आगे बताते हुए कहा कि रैन बसेरा में कई तरह के लाेग रात गुजारने आते है आैर उसके पत्नि के साथ परिवार में दाे बेटी भी है। जिस कराण वह रैन बसेरा में नहीं रहता है।



वहीं दूसरी आेर सराय काले खां के रैन बसेरा में भाला नाम के शाैचालय की सफाई कर्मचारी ने बताया कि वह बचपन से ही फ्लाई आेवर के नीचे रहा है। उसके परिवार में तीन बच्चे भी है जाे पिछले एक साल से सराय काले खां पर स्थित रैन बसेरा में रह रहे है। उसने बताया कि वहां के आसपास के इलाकाें में 7 रैन बसेरा हैं। जिसमें 500 से ज्यादा लाेग हर राेज रात गुजारने आते हैं। उसने आगे कहा कि परिवार हाेने के कारण रैन बसेरा में रहना उचित नहीं है क्याेकि रैन बसेरा में कई तरह के लाेग रात गुजारने के लिए आते हैं। और परिवार में महिला हाेने के कारण यह सब साेचना पड़ता है।

इन लोगों की हालिया स्थिति को देखते हुए एक सवाल जरूर खड़ा होता कि क्या सरकार की योजनाएं महज एक दिखावा भर है? और यदी ऐसा नहीं है तो गरीबों को इसका लाभ क्यों नहीं रहा।