स्कूल ड्राप आउट आदिवासी लड़की की फिल्म को फिल्म फेस्टिवल में दूसरा स्थान 

कोई डेढ़ साल पहले छत्तीसगढ़ का मैनपाट और मांझी जनजाति सुर्खियों में था. तब मांझी जनजाति के पांच वर्षीय एक बच्चे की भूख से मौत हो गई थी. आज फिर मैनपाट और मांझी सुर्खियों में है लेकिन इस बार सुर्खियों की वजह 17 साल की स्कूल ड्राप आउट लड़की अंजलि नाग है. जिसने पूरे देश में अपनी जाति और जगह का नाम रौशन कर दिया है. 17 साल की अंजलि नाग की फिल्म“एजुकेशन फॉर ऑल, एक्सेप्ट गर्ल्स” को ग्रामीण विकास पर हुई नेशनल फिल्म फेस्टिवल में दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित हुई है.

स्कूल ड्राप आउट आदिवासी लड़की की फिल्म को फिल्म फेस्टिवल में दूसरा स्थान 

रूपेश गुप्ता,

कोई डेढ़ साल पहले छत्तीसगढ़ का मैनपाट और मांझी जनजाति सुर्खियों में था. तब मांझी जनजाति के पांच वर्षीय एक बच्चे की भूख से मौत हो गई थी. आज फिर मैनपाट और मांझी सुर्खियों में है लेकिन इस बार सुर्खियों की वजह 17 साल की स्कूल ड्राप आउट लड़की अंजलि नाग है. जिसने पूरे देश में अपनी जाति और जगह का नाम रौशन कर दिया है. 17 साल की अंजलि नाग की फिल्म“एजुकेशन फॉर ऑल, एक्सेप्ट गर्ल्स” को ग्रामीण विकास पर हुई नेशनल फिल्म फेस्टिवल में दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित हुई है.



समारोह का आयोजन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा हैदराबाद में किया गया. विजेताओं को पुरस्कार पेयजल एवं स्वच्छता राज्य मंत्री रमेश चंदप्पा ने दिये. हांलाकि समयाभाव के चलते अंजलि खुद पुरस्कार लेने नहीं जा सकी. यूनिसेफ द्वारा एमएसएसवीपी संस्था के जरिए आदिवासी और स्कूल ड्रॉपआऊट बच्चों को ऑडियो विसुअल मीडियम में ट्रेनिंग कार्यक्रम संगवारी खबरिया सरगुजा के चार ब्लॉकों में चलाया जा रहा है. अंजलि इसी में ट्रेनिंग ले रही है.

करीब दो मिनट चालीस सेकेंड की अपनी फिल्म में अंजलि नाग ने मैनपाट में लड़कियों के ड्रापआऊट के मुद्दे को उठाया है. वो खुद ड्रॉप आऊट रही हैं इसलिए वो बेहतर तरीके से लड़कियों की मजबूरियों और समस्याओं को समझ सकती हैं. प्रोजेक्ट की कोऑर्डिनेटर और अंजलि नाग की मेंटर श्रुति अपसिंगिकर का कहना है कि ये फिल्म लड़कियों के ड्रॉपआऊट होने के असली कारण को सामने लाता है. घर की समस्याएं और स्कूल की दूरी आज भी मैनपाट जैसे सुदूर इलाकों में लड़कियों के लिए बड़ी समस्याएं हैं. फिल्म में जोरदार तरीके से अंजलि ने एक सवाल उठाया है कि शिक्षा से लड़कियों का सशक्तिकरण होता है ये बात क्या मैनपाट के गांववाले समझेंगे? फिल्म की शूटिंग से लेकर एडिटिंग तक सबकुछ अंजली ने खुद किया है

अंजलि मैनपाट के बरिमा में रहती है. उसने 8वीं तक पढ़ाई की है उसके बाद घर की खराब माली हालत के चलते उसे स्कूल छोड़ना पड़ा. उसके हाथ में किताबों की जगह फावड़ा और तगाड़ी आ गई. घर में कुछ पैसे और कमाने के लिए वो खेतीहर मजदूर बन गई. दो साल पहले जब ये प्रोजेक्ट लांच हुआ तब यूनिसेफ की टीम ड्रापआऊट खोजते खोजते अंजलि के घर तक पहुंची और टीम के समस्यों ने अंजलि के मां-बाप को समझाया कि अगर वो कैमरा और कंप्यूटर सीख जाएगी तो उसका भविष्य ज्यादा बेहतर होगा. घरवाले दुविधा में थे लेकिन अंजलि को ये बात जम गई और उसने घरवालों को अपना फैसला सुना दिया.

श्रुति का कहना है कि अंजलि बेहद दृढ़ इरादों की लड़की है और उसे जो बात सही लगती है उसके लिए वो लड़ पड़ती है घरवाले इस बात को जानते थे और उन्हें अंजली के फैसले को मानना ही पड़ा.

हांलाकि अंजली के घरवालों का पूरा सहयोग आज भी उस तरह नही मिल पा रहा है जिस तरह एक लड़के को मिलता है. उसकी फिल्म के चयन से कुछ दिन पहले उसके पिता अंजली को लेने पहुंच गये थे. उन्होंने बताया कि गांव में लोग उसके बाहर रहने पर तरह तरह की बातें करते हैं. बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा बुझाकर भेजा गया.

अंजली को जब ये खबर मिली कि उसकी बनाई फिल्म को अवार्ड मिला है तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ. बाद में जब उसे लोगों के फोन आने लगे, लोग बधाई देने लगे तब जाकर उसे विश्वास हुआ. अंजली यहीं नहीं रुकना चाहती वो आगे एक रिपोर्टर बनना चाहती है. अंजली के टैलेंट से उसको ट्रेनिंग देने वाले आश्वस्त हैं कि अपने गांव की समस्याएं उठाने वाली अंजलि नाग जल्द ही किसी चैनल पर देश और प्रदेश की समस्याएं उठाती दिखे. आमीन.