सायबर पर फना होती यौन वर्जनाएं

अभी छह दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक, व्‍हाट्सएप आदि संचार माध्‍यम अपने साईट से वह सामग्री हटाएं जिसमें किसी महिला के साथ यौनिक अपराध के क्‍लीप हों, पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रयास किया था लेकिन सरकार ने ऐसा करने में असमर्थता दिखाई थी। आज मोबाईल यौनिक कुंठा का अड्डा बन गया है और यह समाज के लिए गंभीर संकेत हैं।

सायबर पर फना होती यौन वर्जनाएं

पंकज चतुर्वेदी,

देश की सर्वोच्च अदालत ने अभी छह दिसंबर 2016 को एक आदेश दिया है कि गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, व्हाट्सएप आदि इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम सुनिश्चित करें कि महिलओं के साथ यौनिक अत्याचार के कोई क्लीप उन पर ना हों। सनद रहे कि यूट्यूब, हो या हाथ का मोबाईल में संचार के विभिन्न माध्यम, हर दिन ऐसे सैंकड़ों क्लीप देखने को मिलते हैं जिसमें कुछ वीडियो किसी महिला का शील भंग कर रहे होते हैं व उनका ही एक साथी उसका वीडियो बनाता है। यह दुखद है कि जिस संचार क्रांति के बल पर सरकार देश को गति देना चाहती है, उसी का इस्तेमाल कुछ लोग अपनी मति भ्रष्ट करने में कर रहे हैं। यह भी याद करें कि अगस्त 2015 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को ऐसे ही एक मामले में कहा था कि वह लोगों के बेड रूम में दखल नहीं कर सकती। लेकिन यह तो सोचना ही होगा कि जब लोगों का बेड रूम या निजी जीवन साईबर-संजाल की मंडी पर बिके और उसे देख कर लोग चस्के लें तो जाहिर है कि सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी बनती ही है। इंटरनेट पर कई करोड़ ऐसे वीडियो, फोटो, क्लीप उपलब्ध हैं जिसमें होटल में ठहरे, पार्क में बैठे या किसी के भरोसे को खुफिया कैेमरे में टूटने के अंतरंग पल जाहिरा हो रहे हैं। कई बार लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे जिस होटल में ठहरे थे या किसी शो रूम के ट्रायल रूम में कपड़े बदल रहे थे, वहां लगे खुफिया कैेमरे से उतारी गई उनकी जीवंत तस्वीरें नेट पर पूरी दुनिया में खूब देखी जा रही हैं।

बीते साल यह तसल्ली कुछ ही घंटे की रही कि चलो अब इंटरनेट पर कुछ सौ नंगी वेबसाईट नहीं खुलेंगी। एक तरफ कुछ ‘‘अभिव्यक्ति की आजादी’’ का नारा लगा कर नंगी साईटों पर पाबंदी की मुखालफत करते दिखे तो दूसरी ओर ऐसी साईटों से करोड़ों पीटने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का छिद्रान्वेषण कर अपनी दुकान बचाने पर जुट गए। एक दिन भी नहीं बीता और अश्लीलता परोसने वाली अधिकांश साईट फिर बेपर्दा हो गईं। कुल मिला कर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ खड़े कर दिए कि सभी नंगी वेबसाईटों पर रोक लगाना संभव नहीं है। संचार के आधुनिक साधन इस समय जिस स्तर पर अश्लीलता का खुला बाजार बन गए हैं, यह किसी से दबा-छुपा नहीं है। कुछ ही महीने पहले ही देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने भी नेट पर परोसे जा रहे नंगे बाजार पर चिंता जताई थी। यह विश्वव्यापी है और जाहिर है कि इस पर काबू पाना इतना सरल नहीं होगा। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश के संवाद और संचार के सभी लोकप्रिय माध्यम देह-विमर्श में लिप्त हैं, सब कुछ खुला-खेल फर्रूकाबादी हो रहा है। अखबार, मोबाईल फोन, विज्ञापन; सभी जगह तो नारी-देह बिक रही है। अब नए मीडिया यानि वाट्सएप, वी चेट जैसी नई संचार तकनीकों ने वीडियो व चित्र भेजना बेहद आसान कर दिया है और कहना ना होगा कि इस नए संचार ने देह मंडी को और सुलभ कर दिया है। नंगेपन की तरफदारी करने वाले आखिर यह क्यों नहीं समझ रहे कि देह का खुला व्यापार युवा लोगों की कार्य व सृजन-क्षमता को जंग लगा रहा है। जिस वक्त उन्हें देश-समाज के उत्थान पर सोचना चाहिए, वे अंग-मोह में अपना समय, उर्जा व शरीर बर्बाद कर रहे है।

अश्लीलताया कुंठा और निर्लज्जता का यह खुला खेल आज संचार के ऐसे माध्यम पर चल रहा है, जो कि हमारे देश का सबसे तेजी से बढ़ता उद्योग है। सरकारी कंपनी बीएसएनएल के संदेश बॉक्स में हर दिन सैकड़ों संदेश आते हैं कि ‘‘ ठंड शुरू हो गई है, अकेले है। तो मुझसे गरम -गरम बातें करो’’ जो संचार माध्यम लोगों को जागरूक बनाने या फिर संवाद का अवसर देने के लिए है, वे अब धीरे-धीरे देह-मंडी बनते जा रहे हैं । क्या इंटरनेट, क्या फोन, और क्या अखबार ? टीवी चैनल तो यौन कुंठाओं का अड्डा बन चुके हैं।

इस समय देश में कोई 80 करोड़ मोबाईल उपभोक्ता हैं। हर दिन पचास करोड़ एसएमएस मैसेज इधर से उधर होने की बात सरकारी तौर पर स्वीकार की गई है। इसमें से 40 प्रतिशत संदेश ऐसे ही गंदे चुटकुलों के होते हैं। यहां जानना जरूरी है कि इस तरीके से चुटकुलों के माध्यम से सामाजिक प्रदूषण फैलाने में मोबाईल सेवा देने वाला ऑपरेटर कमाता है, तो समाज अपनी नैतिकता गंवाता है। इस खेल के खिलाड़ियों के लिए महिला महज एक उपभोग का शरीर रह जाती है। अब तो व्व्हाट्सएप व ऐसे ही कई उपकरण मौजूद हैं जो दृष्य-श्रव्य व सभी तरह के संदेश पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में विस्तारित कर देते है। इन पर कोई अंकुश तो है नहीं, सो इस पर वह सब सरेआम हो रहा है जो कई बार वेबसाईटों पर भी ना हों।

आज आम परिवार में महसूस किया जाने लगा है कि ‘‘ नान वेज ’’ कहलाने वाले लतीफे अब उम्र-रिश्तों की दीवारें तोड़ कर घर के भीतर तक घुस रहे हैं। यह भी स्पष्ट हो रहा है कि संचार की इस नई तकनीक ने महिला के समाज में सम्मान को घुन लगा दी है। टेलीफोन जैसे माध्यम का इतना विकृत उपयोग भारत जैसे विकासशील देश की समृद्ध संस्कृति, सभ्यता और समाज के लिए शर्मनाक है। इससे एक कदम आगे एमएमएस का कारोबार है। आज मोबाईल फोनों में कई-कई घंटे की रिकार्डिग की सुविधा उपलब्ध है। इन फाईलों को एमएमएस के माध्यम से देशभर में भेजने पर न तो कोई रोक है और न ही किसी का डर। तभी डीपीएस, अक्षरधाम, मल्लिका, मिस जम्मू कुछ ऐसे एमएमएस हैं, जोकि देश के हर कोने तक पहुंच चुके हैं। अपने मित्रों के अंतरंग क्षणों को धोखे से मोबाईल कैमरे में कैद कर उसका एमएमएस हर जान-अंजान व्यक्ति तक पहुंचाना अब आम बात हो गई है। किसी भी सुदूर कस्बे में दो जीबी का माईक्रो एसडी कार्ड तीन सौ रूपए में ‘लोडेड’ मिल जाता है - लोडेड यानी अश्लील वीडियो से लबरेज।

आज मोबाईल हैंड सेट में इंटरनेट कनेक्शन आम बात हो गई है और इसी राह पर इंटरनेट की दुनिया भी अधोपतन की ओर है। नेट के सर्च इंजन पर न्यूड या पेार्न टाईप कर इंटर करें कि हजारों-हजार नंगी औरतों के चित्र सामने होंगे। अलग-अलग रंगों, देश, नस्ल, उम्र व शारीरिक आकार के कैटेलाग में विभाजित ये वेबसाईटें गली-मुहल्लों में धड़ल्ले से बिक रहे इंटरनेट कनेक्शन वाले मोबाईल फोन खूब खरीददार जुटा रहे हैं। साईबर पर मरती संवेदनाओं की पराकाष्ठा ही है कि राजधानी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल के बच्चे ने अपनी सहपाठी छात्रा का चित्र, टेलीफोन नंबर और अश्लील चित्र एक वेबसाईट पर डाल दिए। लड़की जब गंदे टेलीफोनों से परेशान हो गई तो मामला पुलिस तक गया। ठीक इसी तरह नोएडा के एक पब्लिक स्कूल के बच्चों ने अपनी वाईस प्रिंसिपल को भी नहीं बख्शा। फेसबुक और अन्य सोशल साईट्स सेक्स की मंडी बने हुए हैं वहां भाभी जैसे पवित्र रिश्ते से ले कर लड़कियों के आम नाम तक हजारों हजार नंगे फोटो से युक्त पेज बने हुए हैं। कुछ साईट तो कार्टून -स्केच में वेलम्मा व सविता भाभी के नाम पर हर दिन हजारों की धंधा कर रही हैं।

अब तो वेबसाईट पर भांति-भांति के तरीकों से संभोग करने की कामुक साईट भी खुलेआम है। गंदे चुटकुलों का तो वहां अलग ही खजाना है। चैटिंग के जरिए दोस्ती बनाने और फिर फरेब, यौन शोषण के किस्से तो आए रोज अखबारों में पढ़े जा सकते हैं।

शैक्षिक, वैज्ञानिक, समसामयिक या दैनिक जीवन में उपयोगी सूचनाएं कंप्यूटर की स्क्रीन पर पलक झपकते मुहैया करवाने वाली इस संचार प्रणाली का भस्मासुरी इस्तेमाल बढ़ने में सरकार की लापरवाही उतनी ही दोषी है, जितनी कि समाज की कोताही। चैटिंग से मित्र बनाने और फिर आगे चल कर बात बिगड़ने के किस्से अब आम हो गए हैं। इंटरनेट ने तो संचार व संवाद का सस्ता व सहज रास्ता खोला था। ज्ञान विज्ञान, देश-दुनिया की हर सूचना इसके जरिए पलक झपकते ही प्राप्त की जा सकती है। लेकिन आज इसका उपयोग करने वालों की बड़ी संख्या के लिए यह महज यौन संतुष्टि का माध्यम मात्र है। वैसे इंटरनेट पर नंगई को रोकना कोई कठिन काम नहीं है, चीन इसकी बानगी है, जहां पूरे देश में किसी भी तरह की पोर्न साईट या फेसबुक पर पूरी तरह पाबंदी है। एक तो उन्हें खोला ही नहीं जा सकता, यदि किसी ने हैक कर ऐसा कुछ किया तो पकड़े जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान है। बीजिंग जैसे शहर में वाई-फाई और थ्रीजी युक्त मोबाईल आम हैं, लेकिन मजाल है कि कोई ऐसी-वैसी साईट देख ले। यह सब बहुत ही समान्य तकनीकी प्रणाली से किया जा सकता है।

दिल्ली सहित महानगरों से छपने वाले सभी अखबारों में एस्कार्ट, मसाज, दोस्ती करें जैसे विज्ञापनों की भरमार है। ये विज्ञापन बाकायदा विदेशी बालाओं की सेवा देने का ऑफर देते हैं। कई-कई टीवी चैनल स्टींग आपरेशन कर इन सेवाओं की आड़ में देह व्यापार का खुलासा करते रहे है। हालांकि यह भी कहा जाता रहा है कि अखबारी विज्ञापनों की दबी-छिपी भाषा को तेजी से उभर रहे मध्यम वर्ग को सरलता से समझाने के लिए ऐसे स्टींग आपरेशन प्रायोजित किए जाते रहे हैं। ना तो अखबार अपना सामाजिक कर्तव्य समझ रहे हैं और ना ही सरकारी महकमे अपनी जिम्मेदारी। दिल्ली से 200-300 किलोमीटर दायरे के युवा तो अब बाकायदा मौजमस्ती करने दिल्ली में आते हैं और मसाज व एस्कार्ट सर्विस से तृप्त होते हैं।

मजाक, हंसी और मौज मस्ती के लिए स्त्री देह की अनिवार्यता का यह संदेश आधुनिक संचार माध्यमों की सबसे बड़ी त्रासदी बन गया हैं। यह समाज को दूरगामी विपरीत असर देने वाले प्रयोग हैं। चीन, पाकिस्तान के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां किसी भी तरह की अश्लील साईट खोली नहीं जा सकती। यदि हमारा सर्च इंजन हो तो हमें गूगल पर पाबंदी या नियंत्रित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी और एक बार गूगल बाबा से मुक्ति हुई, हम वेबसाईटों पर अपने तरीके से निगरानी रख सकेंगें। कहीं किसी को तो पहल करनी ही होगी, सो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पहल कर चुके हैं। अब आगे का काम नीति-निर्माताओं का है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।)