अखिलेश यादव का समाजवाद या समाजवादियाें का साम्राज्यवाद !

अखिलेश जाे की युवा नेता के बताैर अपनी छवी बनाई है। क्या उनकी यह छवी आगामी यूपी चुनाव में साईकल पे सवार हाे कर अपनी पार्टी का बैड़ा पार कर सकेगें?

अखिलेश यादव का समाजवाद या समाजवादियाें का साम्राज्यवाद !

यूपी चुनाव से ठीक पहले यूपी की सत्ताधारी पार्टी समाजवादी पार्टी में आगामी चुनाव काे लेकर काफी उथल-पुथल देखा जा रहा है। एक तरफ अखिलेश यादव हैं जिन्होंने बताैर यूवा नेता अपनी छवी बनाई है। अखिलेश ने 2012 के यूपी विधान सभा चुनाव में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया था,उनकी पार्टी को राज्य में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद, 15 मार्च 2012 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।

जिसने उत्तर प्रदेश में चूहमुखी विकास किया,  जहां  लैपटॉप, कम्प्यूटर जैसी आई.टी आधारित डिवाइसों के महत्व को पहले ही पहचान लिया था। इसलिए उन्हाेने प्रदेश के छात्र-छात्राओं को निःशुल्क लैपटॉप वितरण किया था। देश और प्रदेश के विकास में डिजिटल टेक्नोलॉजी के योगदान के मद्देनजर राज्य सरकार ने इस कार्य को प्राथमिकता दी थी।

शुरुआत में विरोधियों को यह बात समझ में नहीं आयी, परन्तु अब वे खुद समाजवादी सरकार की तमाम योजनाओं की नकल कर रहे हैं। अगर समाजवादी  पार्टी की सरकार बनती है तो वर्ष 2017 में समाजवादी स्मार्टफोन योजना क्रियान्वित करेगी। इस योजना के पात्र लाभार्थियों को निःशुल्क स्मार्टफोन उपलब्ध कराया जाएगा। सीएम ने कहा कि स्मार्टफोन पाने के लिए अब तक एक करोड़ रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। यह योजना उत्तर प्रदेश में क्रान्ति लाएगी।  वहीं पर 2017  यूपी विधान सभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी पारिवारिक विवाद से चर्चा में है।

मुलायम सिंह, अमर सिंह आैर आजम खान का समाजवादी रिश्ता 

दूसरे तरफ हैं मुलायम सिंह यादव जिनपर परिवारवाद का तमगा लगा हुआ है। जो  खुद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, आैर उनके दो भाई पार्टी के महासचिव और बेटा प्रदेश अध्यक्ष है। यह समाजवाद है या परिवारवाद? इस सवाल ने भारतीय राजनीति में परिवारवाद के मुद्दे को एक बार फिर से गरम कर दिया है। भारत की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला अब काफी बढ़ गया है। शायद ही कोई पॉलिटिकल पार्टी ऐसी हो, जिसमें परिवारवाद और वंशवाद की बेल दिखाई नहीं पड़ती हो। इसी बीच समाजवादी पार्टी में कई आैर एेसे नेता है, जैसे आजम खान, अमर सिंह, बताया जा रहा है कि इनके बीच छत्तीस का आंकड़ा जग जाहिर है। दोनों ही नेता समाजवादी पार्टी से बाहर किए जा चुके हैं जिसके लिए दोनों एक-दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। दाेनाे एक दूसरे पर कटाक्ष करने का कोई भी मौका नहीं गवांते।

समाजवादी पार्टी का परिवारिक झगड़ा

बीते दिनाें परिवारिक तकरार की वजह से अखिलेश ने शिवपाल सिंह यादव से मंत्री पद का विभाग छीन लिया था। मंत्री पद छीनने के बाद शिवपाल ने अपनी चुप्पी ताेड़ते हुए कहा था कि यह परिवार का झगड़ा नहीं है बल्कि सरकार का झगड़ा है। पिछले दिनाें अखिलेश ने अपने पार्टी के कई कार्यकर्ता आैर एमएलए काे पार्टी से निकाल दिया था। इस मामले काे लेकर अखिलेश सिंह यादव की खूब आलाेचना हुई थी। पार्टी के नेताआें का कहना था कि अखिलेश अपनी मनमानी कर रहे है। इसी बात काे लेकर शिवपाल यादव ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्हाेने यह कहा था कि पार्टी में किसी की हैसियत नहीं है कि वो सपा मुखिया के आदेश का पालन न करे।

अब यह देखना है कि अखिलेश अपनी छवी काे लेकर आगामी यूपी चुनाव में जीत पाएंगे या नहीं.. जहां एक तरफ केंद्र में भाजपा है, जिसके लिए यूपी चुनाव काफी अहम है, जिसकाे लेकर भाजपा किसी भी हद तक जा सकती है। आैर दूसरी तरफ है बीएसपी जाे मायावती की अगुवाई में यूपी चुनाव लड़ेगी। मालूम हाेता है कि यह चुनाव अखिलेश के लिए काफी कठिन है। लेकिन क्या अखिलेश यूपी चुनाव में अपनी छवी काे लकर फिर से साईकल पर सवार हाे कर सामजवाद काे ला पाएंगे या फिर अपने परिवारवाद के जाल में फंस कर समाजवाद की राजनीति काे नहीं बचा पाएंगे।