नाम ही नहीं परिस्थितियां भी बदले...

एक बार हादसे में मेरी पसली में मामूली फ्रैक्चर हो गया। बड़ी बारीक एक्सरे से यह पकड़ में आया। हालांकि कुछ दिनों तक कीमती कैलशियम कैप्सूल से ही समस्या दूर हो गई।

नाम ही नहीं परिस्थितियां भी बदले...

तारकेश कुमार ओझा

एक बार हादसे में मेरी पसली में मामूली फ्रैक्चर हो गया। बड़ी बारीक एक्सरे से यह पकड़ में आया। हालांकि कुछ दिनों तक कीमती कैलशियम कैप्सूल से ही समस्या दूर हो गई। न टूटी पसली में प्लास्टर चढ़ाने की जरूरत पड़ी और न किसी तरह के विशेष परहेज की। लेकिन कुछ दिनों के उपचार के दौरान मिली असह्य पीड़ा ने मुझे बेहाल कर दिया। उस दौरान मैं सोचता रहता कि यदि टूटी पसली को जोड़ने के लिए मुझे प्लास्टर चढ़ाना पड़ता तो लगातार कई दिनों तक मुझे न जाने कितने ही परहेज और सावधानी बरतनी पड़ती।

मेरा दैनंदिन जीवन ठप पड़ जाता। मुझे स्नान आदि अनेक कर्म से वंचित रहना पड़ता। तभी मुझे उन दिव्यांगों का ख्याल आया जो आजीवन इस प्रकार की परिस्थितियां झेलने को अभिशप्त हैं। तब मुझे अपने मोहल्ले के उस गरीब का ख्याल बार – बार मेरे जेहन में आता जो गरीबी और दिव्यांगता की दोहरी मार झेलते हुए भी रिक्शा चलाने को मजबूर है। उस बेचारे की गर्दन में कुछ विकृतियां है। वह सीधे खड़े नहीं हो पाता। एक और दिव्यांग श्रमिक को मैने निर्माण जैसे कठोर श्रम साध्य कार्य में जुटे देखा था। यही नहीं एक हाथ के अचल रहने से लाचार एक ऐसे युवक को भी मैं जानता हूं जो बेचारा पूरे दिन नुक्कड़ की चाय की एक दुकान पर एक हाथ से ग्लास साफ करता  घूम – घूम कर आर्डर वाले स्थानों पर चाय पहुंचाता था। उस बेचारे को झूठे ग्लास के लिए फिर उन स्थानों पर जाना पड़ता था।

ऐसे लाचार – मजबूर दिव्यांगों का ख्याल कर मैं सोच में पड़ जाता कि हादसे के चलते मुझे कुछ परेशानियां हुई जो जल्द ही दूर हो जाएगी। लेकिन इन बेचारों को तो आजीवन या यूं कहें कि आखिरी सांस तक दिव्यांगता और गरीबी की दोहरी मार झेलना ही झेलना है। समय के साथ अपाहिज – विकलांग और अब दिव्यांग हो गए हैं। लेकिन अधिकांश दिव्यांगों की स्थिति में क्या कोई बड़ा परिवर्तन आया है। बेशक आज सरकार दिव्यांगों के हित में अनेक कदम उठा रही है। उन्हें यात्रा से लेकर नौकरी तक में छुट और सुविधाएं दी जा रही है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन सुविधाओं का लाभ ज्यादातर वे ही उठा पाते हैं जो कुछ पढ़े – लिखे या जागरूक हैं। अधिकांश मजबूर – लाचार तो बेचारे जिल्लत की जिंदगी जीने को ही मजबूर हैं। इसलिए विश्व दिव्यांग दिवस पर हर किसी को संकल्प लेना चाहिए कि नाम के साथ दिव्यांगों के जीवन की परिस्थितियां भी बदले।