क्या आरएसएस के अंदर की खेमेबाजी बीजेपी को यूपी में ले डुबेगी ?

आरक्षण पर मनमोहन वैद्य का बयान यूं ही नहीं आया है। ये संघ के अंदर चल रही खेमेबाजी का नतीजा भी हो सकता है।

क्या आरएसएस के अंदर की खेमेबाजी बीजेपी को यूपी में ले डुबेगी ?

बीजेपी ने यूपी में अपनी सारी ताकत झोक रखी है। अमित शाह एंड कंपनी की कोशिश है कि किसी भी तरीके से लखनऊ पर काबिज हुआ जाए। इसके लिए बीजेपी चीफ ने सारे घोड़े दौड़ा रखे है। लेकिन इसी बीच बीजेपी नेताओं को यूपी की बाजी हाथ से जाने के भी सपने आने लगे है। बीजेपी नेताओं को डर है कि कही वैसा ना हो जाए जैसा बिहार में हुआ था। इसके पीछे वजह है आरएसएस प्रवक्ता मनमोहन वैद्य का आरक्षण पर बयान। सूत्रो से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक आरएसएस के अंदर के खेमेबाजी यूपी में बीजेपी की नैया फंसा सकती है। खबर तो यहां तक है कि आरएसएस के अंदर का ही एक गुट नहीं चाहता कि बीजेपी यूपी की बाजी मार पाए। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि मनमोहन वैद्य का आरक्षण वाला बयान यू ही नहीं आया है। ये संघ के अंदर की खेमेबाजी का नतीजा है। जयपुर साहित्य सम्मेलन के मंच से वैद्य का कहना था कि ‘शिक्षा और नौकरियों में जातिगत आरक्षण तुरंत खत्म होना चाहिए. उनके इस बयान की वजह से भाजपा को बिहार में मिली करारी हार के सपने आने लगे हैं. बिहार चुनाव से पहले भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया गया बयान आज तक भाजपा नेता भूले नहीं हैं।

बीजेपी के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ वरिष्ठ लोग अब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते है। मोदी प्रचारक से प्रधानमंत्री बन गए लेकिन संघ के कुछ प्रचारक मोदी की अभूतपूर्व सफलता आज तक पचा नहीं पाए हैं. समस्या सिर्फ मोदी से नहीं है. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात से हैं, प्रधानमंत्री के सबसे करीबी हैं और देश के दूसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं. वे एक विधायक से भाजपा अध्यक्ष बने हैं. अमित शाह की ऐसी तरक्की और रसूख से भी संघ में जलने वाले कई नेता हैं. संघ में कई लोग मोदी और शाह की जोड़ी से इसलिए भी चिढ़ते हैं कि उन्होंने संघ और उसके परिवार के अन्य संगठनों को कभी गुजरात में उतने भाव नहीं दिये।

भाजपा के एक नेता कहते हैं कि संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य मोदी विरोधी खेमे के हैं और आरएसएस के सहसरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले मोदी समर्थक हैं।

भाजपा और संघ दोनों को पता है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव मोदी सरकार और भाजपा अध्यक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान है. अगर बिहार के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश में चुनाव हारती है तो विरोधियों के हौंसले बुलंद होंगे और सियासी पंडित इसे मोदीराज के पतन की शुरुआत बता देंगे। आरएसएस में दो कैंप बन गए हैं एक कैंप मोदी और अमित शाह की जोड़ी का जबरदस्त समर्थक है और दूसरा कट्टर विरोधी. जयपुर में साहित्य मेले के मंच पर जो हुआ इसी खेमेबाजी का नतीजा है।

आरएसएस के प्रचारक रहे भाजपा के एक नेता कहते हैं कि संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य मोदी विरोधी खेमे के हैं और आरएसएस के सहसरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले मोदी समर्थक हैं. जब साहित्य सम्मेलन में आरक्षण के मुद्दे पर सवाल पूछा गया तो उस वक्त मंच पर मनमोहन वैद्य भी थे और दत्तात्रेय होसबोले भी. भाजपा के कुछ नेताओं को मननहोन वैद्य की बात इसलिए भी खटक रही है कि सवाल मुस्लिम आरक्षण और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बारे में पूछा गया था लेकिन मनमोहन वैद्य ने जवाब जातिगत आरक्षण पर दे दिया. भाजपा के नेता ये जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया गया, और क्या इसकी कोई सजा संघ अपने प्रचार प्रमुख को सुनाएगा।

सुनी-सुनाई बातों पर भरासा करें तो मनमोहन वैद्य की दोस्ती संघ के एक ऐसे प्रचारक से है जिन्हें मोदी की वजह से भाजपा से निकाला गया. वैद्य और उनके पिताजी मागो वैद्य कई साल से संघ में मोदी के विरोध की राजनीति करते हैं. लेकिन संघ में इस वक्त मोदी समर्थकों का खेमा इतना मजबूत है कि विरोधी खेमे की ज्यादा चल नहीं पाती।

इस सबके बावजूद संघ में परंपरा और अनुशासन का एक दायरा भी है. यहां से किसी को निकाला नहीं जाता, प्रचारक परमानेंट होता है, वह अपनी इच्छा से ही सेवानिवृत्त हो सकता है और एक दूसरे के खिलाफ टीका-टिप्पणी करने पर प्रतिबंध है इसलिए जो होता है वह बेहद गोपनीय ढंग से होता है. लेकिन इस बार बात कुछ आगे चली गई.

ऐसा पहली बार हुआ जब संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने पद की बात की और कहा कि मैं सहसरकार्यवाह की हैसियत से आरएएस की राय आपके सामने रख रहा हूं, इसलिए प्रचार प्रमुख की राय अब मायने नहीं रखती.

आरएसएस को करीब से जानने वाले बताते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारी ने अपने पद की बात की और कहा कि मैं सहसरकार्यवाह यानी महासचिव की हैसियत से आरएएस की राय आपके सामने रख रहा हूं, इसलिए प्रचार प्रमुख की राय अब मायने नहीं रखती. आरएसएस ने इस पूरे विवाद को धर्म से जोड़ने की कोशिश की, दत्तात्रेय ने जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण पर दिए बयान को धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग से जोड़ दिया.

निजी बातचीत में बिहार के नेता साफ-साफ कहते हैं कि जब तक मोहन भागवत का बयान नहीं आया था भाजपा बिहार का चुनाव जीत रही थी, लेकिन बयान के बाद बाज़ी पलट गई. प्रधानमंत्री मोदी की सफाई और अमित शाह के इंटरव्यू से भी उस नुकसान की भरपाई नहीं हो पाई. इस बार भी उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले आरएसएस ने ऐसा ही क्या? उसने जयपुर साहित्य सम्मेलन के मंच से ऐसी सियासी बात कर दी जिसका असर लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की राजनीति पर हुआ है।

इतना ही नहीं आरएसएस की खेमेबाजी का असर बीजेपी के चुनाव प्रचार पर भी पड़ा है। आरएसएस अपनी प्लानिंग के तहत बूथ बूथ जाकर मतदाताओं को जागरुक कर रहा है। आरएसएस की बूथ स्तर तक मतदाताओं को जागरुक करने प्लान लोकसभा चुनाव की तरह कामयाब हो पाएगा नहीं इस पर भी सवाल बना हुआ है।

भाजपा की पूरी रणनीति पर ये बयान भारी पड़ रहा है। और भाजपा के नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए है। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए पिछड़ा कार्ड खेला है. गैर यादव पिछड़ा वोटरों को एकजुट करने के लिए भाजपा ने बड़े पैमाने पर पिछड़े नेताओं को टिकट दिया है. अपने परंपरागत वोट बैंक समझे जाने वाले ब्राह्मण समाज के नेताओं को सिर्फ दस फीसदी सीटों पर टिकट मिला. ऐसे में आरएसएस की तरफ से फेंका गया एक पत्ता भाजपा के पूरे खेल को खराब कर सकता है. संघ के एक प्रचारक कहते हैं, आरएसएस के खेल को कोई बाहरी समझ नहीं सकता. यह होती है शह और मात... लाठी चली, आवाज़ भी नहीं आई और चुनाव का रुख बदल गया. अब मोदी-शाह की जोड़ी को साबित करना होगा कि वे आरएसएस के बयान के साथ हैं या आरएसएस के खिलाफ।