पारसी समुदाय गिद्ध कम होने से शव काे खुला छाेड़ने का पुराने परमपरा काे छाेड़ सकतें है

गुजरात के पारसी समुदाय अंतिम संस्‍कार की अपनी सदियों पुरानी परंपरा को छोड़कर दफनाने की पद्धति को अपना सकता है।

पारसी समुदाय गिद्ध कम होने से शव काे खुला छाेड़ने का पुराने परमपरा काे छाेड़ सकतें है

गुजरात के पारसी समुदाय अंतिम संस्‍कार की अपनी सदियों पुरानी परंपरा को छोड़कर दफनाने की पद्धति को अपना सकता है। बताया जा रहा है कि पा‍रसियों में मौत के बाद शव को पक्षियों और जानवरों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके तहत एक तय जगह पर शव को रख दिया जाता है। लेकिन गिद्धों की कम होती संख्‍या के कारण समुदाय इस परंपरा को बदल सकता है। मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के नवसारी में बैठक में शव को दफनाने के पक्ष में समुदाय के लोगों ने भारी समर्थन दिया।

मीडिया काे पारसी समुदाय अंजुमन के सचिव यज्‍दी कसाद ने बताया, ”हमने बैठक बुलाई थी और इसमें एक मुद्दा कब्रिस्‍तान के बारे में चर्चा करना था। कब्रिस्‍तान के विरोध में केवल छह लोग थे।” कसाद ने साथ ही कहा कि शव को दफनाने या उसे खुले में छोड़ने, दोनों तरीके चलते रहेंगे और परिवार को अंतिम संस्‍कार का तरीका चुनने की आजादी होगी। पारसियों में अंतिम संस्‍कार में बदलाव का यह पहला मामला नहीं है। बेंगलुरु और सोलापुर में भी इस तरह की अनुमति दी जा चुकी है। पारसी समुदाय दोखमेनाशिनी पद्धति में विश्‍वास करती है। इसमें शवों को कुंओं के अंदर छोड़ दिया जाता है या फिर सूरज की रोशनी में दखमास में मांस खाने वाले पक्षियों के लिए छोड़ दिया जाता है। लेकिन गिद्धों की घटती संख्‍या के चलते अंतिम संस्‍कार का तरीका बदलने की मांग उठ रही है।

पिछले सप्‍ताह 160 नवसारी पारसियों ने आरामगाह या कब्रिस्‍तान के मांग पत्र पर दस्‍तखत किए थे। नवसारी के एक पारसी व्‍यक्ति ने मीडिया  को बताया, ”हम पुराने तरीके को भी बनाए रखना चाहते हैं लेकिन विकल्‍प भी चाहिए।” अंतिम संस्‍कार के तरीके को बदलने की मांग हालांकि समुदाय के लोगों को रास नहीं आ रही है। समुदाय के एक बड़े पुजारी दस्‍तुर डॉ. फिरोज कोटवा ने बताया कि परंपरागत तरीके को मजबूत करने के बजाय दूसरे तरीकों को अपनाना अस्‍वीकार्य है।