स्कूल में मिल रही है गैर-मुसलमानों से नफरत की शिक्षा!

ब्रिटेन के एक इस्लामिक स्कूल में मुस्लिम किशोरों को एक धार्मिक उपदेशक गैर-मुस्लिमों (हिंदुओं और इसाइयों) से नफरत करने की सीख दे रहा है।

स्कूल में मिल रही है गैर-मुसलमानों से नफरत की शिक्षा!

ट्विटर पर कथित तौर पर ब्रिटेन के एक इस्लामिक सेंटर का वीडियो प्रकाश में आया है जिसमें मुस्लिम किशोरों को एक धार्मिक उपदेशक गैर-मुस्लिमों (हिंदुओं और इसाइयों) से नफरत करने की सीख दे रहा है। ये वीडियो वॉयस ऑफ यूरोप (@V_of_Europe) ट्विटर हैंडल से शेयर किया गया है।

वीडियो में एक व्यक्ति कह रहा है कि काफिर हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं। वीडियो एंकर के अनुसार मुस्लिम किशोरों को उपदेश देने वाले की उम्र भी करीब 18-19 साल ही लग रही है। वॉयस ऑफ अमेरिका ट्विटर हैंडल के 80 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं। इस वीडियो को ढाई हजार से अधिक बार रीट्वीट किया जा चुका है।

वीडियो एंकर के मुताबिक, ये वीडियो ब्रिटेन स्थित एक इस्लामी सेकेंडरी स्कूल के अंदर का है। वीडियो एंकर के अनुसार उपदेशक ने वहां मौजूद किशोरों से हिंदुओं और दूसरे मूर्तिपूजकों के बार में पूछा, 'क्या उनके पास दिमाग होता है?' सवाल के जवाब में कई किशोर 'नहीं' कहते सुने जा सकते हैं।

ब्रिटेन समेत पूरा यूरोप पिछले कई सालों से मुस्लिम युवाओं के बीच बढ़ते चरमपंथी रुझान को लेकर चिंतित रहा है। ब्रिटिश सरकार ने किशोरों और नौजवानों को इस्लामी चरमपंथियों की चपेट में आने से बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं। आतंकवादी संगठन आईएस में ब्रिटेन और यूरोप के कई नौजवानों को इंटरनेट के माध्यम से भर्ती कराने वाला जिहादी जॉन भी ब्रिटिश नागरिक था। जिहादी जॉन 2015 में मारा गया था। कई मुस्लिम मौलाओं ने अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे देशों के मुस्लिम युवाओं से आतंकी उपदेशकों के प्रति आगाह भी किया गया है।

ब्रिटेन में कई चरमपंथी इस्लामिक उपदेशकों के खुले आम मस्जिदों और मदरसों में भाषण देने का मुद्दा भी सुर्खियों में रहा है। गेट्सस्टोन इंस्टीट्यूट के मुताबिक करीब 1 लाख ब्रिटिश मुस्लिम आत्मघाती आतंकवादी हमला करने वालों से सहानुभूति रखते हैं।

संस्था की 615 पन्नों की रिपोर्ट के मुताबिक, केवल 34 प्रतिशत ब्रिटिश मुस्लिम अपने किसी नजदीकी के चरमपंथी गतिविधियों से जुड़ने की आशंका के बारे में पुलिस को सूचित करेंगे। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 23 प्रतिशत ब्रिटिश मुसलमानों का मानना है कि बड़ी मुस्लिम आबादी वाले ब्रिटिश इलाकों में ब्रिटिश कानून की जगह इस्लामी शरिया कानून लागू होना चाहिए।