यहां पढ़े ओम पूरी का पूरा फिल्मी करियर, जानिए कब क्या किया

बॉलीवुड अभिनेता ओम पुरी हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। ओम पूरी ने हिंदी फिल्मों में ही नहीं बल्कि पंजाबी, मराठी यहां तक की ब्रिटिश और अमेरिकी सिनेमा में भी योगदान किया है...

यहां पढ़े ओम पूरी का पूरा फिल्मी करियर, जानिए कब क्या किया




बॉलीवुड अभिनेता ओम पुरी हिन्दी फिल्मों के एक मशहूर अभिनेता हैं। ओम पूरी ने हिंदी फिल्मों में ही नहीं बल्कि पंजाबी, मराठी यहां तक की ब्रिटिश और अमेरिकी सिनेमा में भी योगदान किया है। ओम पूरी पद्मश्री पुरस्कार विजेता भी हैं, जो कि भारत के नागरिक पुरस्कारों के पदानुक्रम के चौथे पुरस्कार में आता है। ओम पूरी का जन्म18अक्टूबर 1950 में हरियाणा के अम्बाला नगर में हुआ। उनके पिता रेलवे और इंडियन आर्मी में काम करते थे।



ओम पूरी की शिक्षा

ओम पूरी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल पंजाब के पटियाला से पूरी की। 1976 में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षण मिलने के बाद ओमपुरी ने लगभग डेढ़ साल तक एक स्टूडियो में अभिनय की शिक्षा दी। उसके बाद उन्होंने 1973 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग सिखी जहां से नसीरूद्दीन शाह ने एक्टिंग सिखी थी। उसके बाद ओम पुरी ने अपने निजी थिएटर ग्रुप "मजमा" की स्थापना की। ओमपुरी की शादी नंदिता पूरी के साथ हुई। लेकिन साल 2016 में ओम पूरी और उनकी पत्नी अलग हो गए |



फ़िल्मी करियर 

ओम पुरी ने अपने फ़िल्मी सफर की शुरुआत मराठी नाटक पर आधारित मराठी फिल्म 'घासीराम कोतवाल' से की थी। लेकिन हिंदी फिल्मों की शुरूआत उन्होंने 1980 में रिलीज फिल्म "आक्रोश" से की थी जो उनके करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिससे उन्हें फिल्मी दुनिया में एक अगल पहचान मिली। फिल्म आक्रोश के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया था। ओम पूरी ने अपने हिंदी सिनेमा करियर में कई सफल फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय का परिचय दिया है। ओम पूरी ने करीब 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। फिल्मी परिवार से न होने के बावाजूद ओम पूरी ने हिंदी सिनेमा में अपनी एक खास जगह बनाई। लेकिन फिल्मी करियर बनाने के लिए ओम पूरी को काफी संघर्ष भी करना पड़ा। हिंदी सिनेमा में बेहतरीन अभिनय के चलते ओम पूरी को कई पुरुस्कारों से भी नवाजा गया।

 




अवॉर्ड

ओम पूरी ने अपने फिल्मी करियर में कई अवॉर्ड अपने नाम किए। उन्होंने पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड अपने नाम किया उसके बाद उन्हें पद्म श्री अवॉर्ड से नवाजा गया। ओम पूरी को fourth highest civilian award of India से भी नवाजा गया। इसके अलावा भी उन्होंने कई अवॉर्ड अपने नाम किए।



ओम पूरी की फिल्में 


ओम पूरी ने अपने फिल्मी करियर में बहुत सारी बॉलीवुड हिट फिल्में की जैसे- भूमिका (1977), अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूं आता है (1980), आक्रोश (1980), गाँधी (1982), विजेता (1982), आरोहन (1982), अर्ध सत्या (1983), नासूर (1985), घायल (1990), नरसिम्हा (1991), सिटी ऑफ जॉय (1992), द घोस्ट एंड द डार्कनेस (1996), माचिस (1996), चाची 420 (1997), गुप्त: द हिडन ट्रुथ (1997), मिर्तियुदंड (1997), प्यार तो होना ही था (1998), विनाशक – डिस्ट्रॉयर (1998), हे राम (2000), कुंवारा (2000), हेरा फेरी (2000), दुल्हन हम ले जाएंगे (2000), फर्ज (2001), गदर: एक प्रेम कथा (2001), आवारा पागल दीवाना (2002), चोर मचाये शोर (2002), मकबूल (2003), आन: मेन एट वर्क (2004), लक्ष्य (2004), युवा (2004), देव (2004), दीवाने हुए पागल (2005), रंग दे बसंती (2006), मालामाल वीकली (2006), चुप चुप के (2006), डॉन: द चेस बैगिन्स अगेन (2006), फूल एंड फाइनल (2007), मेरे बाप पहले आप (2008), किस्मत कनेक्शन (2008), सिंग इज किंग (2008), बिल्लू (2009), लंदन ड्रीम्स (2009), कुर्बान (2009), दिल्ली-6 (2009), दबंग (2010), डॉन 2: द किंग इज बैक (2011), अग्निपथ (2012), ओएमजी: ओह माय गॉड! (2012), कमाल धमाल मालामाल (2012), बजरंगी भाईजान (2015), मिस तनकपुर हाजिर हो (2015), घायल वन्स अगेन (2016), द जंगल बुक (2016) और एक्टर इन लॉ (2016) में काम किया।



ओम पूरी के फेमस डायलॉग



फिल्म कैसी भी हो यदि उसमें ओम पुरी ने किरदार निभाया तो वाकई में वह कमाल की फिल्म हो जाती थी। फिल्म में कॉमेडी का तड़का हो या फिर मारधाड़ का मसाला ओम पुरी हर किरदार में फिट बैठ जाते थे। उन्हें मैंन स्ट्रीम इंडियन सिनेमा के साथ-साथ आर्ट फिल्मों के लिए भी जाना जाता था। इस संजीदा एक्टर ने कई फिल्मों में जर्बदस्त कॉमेडी भी की है, जिनके कुछ डायलॉग बेहद पॉपुलर भी हुए हैं।

हीरा, क्या गाय थी गांव में, 10 लीटर दूध देती थी। जब ठुमक-ठुमक कर चलती थी तो सारे गांव के बैल उस पर मरते थे। उसका स्मारक बनाना -आवारा पागल दीवाना।





मरने से पहले मेरे बाल डाई कर देना, आई वांट टू डाई यंग

अगर मैं मर गया, मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा
 सुना है आजकल छोटी-छोटी लड़कियों को हम जैसे बड़े लोग पसंद हैं...मेरे साथ ऐसा पहली बार हो रहा है


ये बगीचे इतने बड़े क्यों होते हैं, एक फूल-एक फब्बारा...बात खतम...इतने ताम-झाम की क्या जरूरत


कुंडली से यारी तो क्या करेगी फौजदारी




 जैसे ही मैंने उसकी कनपटी पर यह गनपट्टी रखी, उसका चेहरा बिना दूध की चाय जैसा पड़ गया


मुझे कोई नहीं मार सकता...न आगे से, न पीछे से...न दाएं से, न बाएं से...न आदमी, न जानवर...न अस्त्र, न शस्त्र

हर जूती यह सोचती है कि वह पगड़ी बन सकती है..मगर जूती की किस्मत है कि उसे पैरों तले रौंदा जाए...और पगड़ी का हक है कि उसे सर पर रखा जाए

मैं जब भी करता हूं, इन्साफ ही करता हूं


द्रोपदी तेरी अकेले की नहीं, हम सब शेयरहोल्डर हैं

शराबी तो शराबी की मदद करेगा

समाज की गंदगी साफ़ करने का कीड़ा है मेरे अंदर





एक वक्त पर मैं सिर्फ एक ही काम करता हूं...जब पीता हूं तो खूब पीता हूं...और जब ड्यूटी करता हूं तो सिर्फ ड्यूटी करता हूं

एक सच्चा आदमी ही अपने सर पर गोली खाने के लिए तैयार हो सकता है





मैं ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता...जो गरीबों की इज्जत करना नहीं जानता

जिस दिन पुलिस की वर्दी का साथ पकड़ा, उस दिन डर का साथ छोड़ दिया

यकीन को हमेशा वक़्त के पीछे चलना चाहिए...आगे नहीं

मजहब इंसानों के लिए बनता है, मजहब के लिए इंसान नहीं बनते

ये मूंछ तेरे बाप के खेत पर नहीं उगाई है