गठबंधन भरोसे आरएलडी,अब आगे क्या होने वाला है ?

सपा से झटका खाने के बाद आरएलडी ने प्लान बी के तहत काम करना शुरु कर दिया है अब आरएलडी यूपी की सभी 403 सीटों पर करीब दर्जन भर छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में सवाल है कि आखिर ऐसे आरएलडी का ऐसा हाल कैसे हो गया ? कभी किसानों के दिलों पर राज करने वाली पार्टी रालोद का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है।

गठबंधन भरोसे आरएलडी,अब आगे क्या होने वाला है ?

वजह चाहे जो भी रही हो अब ये साफ हो चुका है कि आरएलडी और सपा का गठबंधन नहीं होगा। इससे सपा का कितना नुकसान होगा या फिर क्या फायदा होगा इसका तो बस आंकलन ही किया जा सकता है। लेकिन आरएलडी की प्लानिंग को झटका जरुर लगा है। सपा से झटका खाने के बाद आरएलडी ने प्लान बी के तहत काम करना शुरु कर दिया है अब आरएलडी यूपी की सभी 403 सीटों पर करीब दर्जन भर छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में सवाल है कि आखिर ऐसे आरएलडी का ऐसा हाल कैसे हो गया ? कभी किसानों के दिलों पर राज करने वाली पार्टी रालोद का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है।

राजनैतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे हालात में जब रालोद का सपा के साथ गठबंधन नहीं है तो इसका खामियाजा सपा, कांग्रेस और रालोद तीनों को उठाना पड़ सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले चरण में होने वाले चुनाव में सपा, कांग्रेस व लोकदल को नुकसान का खतरा है। इसका सीधा फायदा बसपा और बीजेपी को हो सकता है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद मुसलमान लोकदल से पूरी तरह छिटक गया था। लेकिन अगर सपा, कांग्रेस व लोकदल के बीच गठबंधन होता तो कयास लगाए जा रहे थे कि मुसलमान बीजेपी को हराने के लिए एकतरफा इस गठबंधन का साथ देता। लेकिन इस गठबंधन के न होने पर मुसलमान सपा, कांग्रेस के साथ ही बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों को अपना समर्थन देगा।

सियासी हलकों में चर्चा ये भी है कि सपा से गठबंधन नहीं होने पर अजित सिंह, बीजेपी के साथ हाथ मिला सकते हैं. यह इसलिए भी अहम है क्‍योंकि यदि ध्रुवीकरण होता है और रालोद-बीजेपी गठबंधन होता है तो इसका लाभ बीजेपी को मिल सकता है. हालांकि जानकारों के मुताबिक इस बात की संभावना बहुत कम ही दिखती है क्‍योंकि पश्चिमी यूपी में पहले और दूसरे चरणों में ही मतदान होना है और बीजेपी पहले ही यहां से अपने प्रत्‍याशियों को घोषित कर चुकी है. ऐसे में अब उसके पास रालोद से गठबंधन के लिहाज से ज्‍यादा विकल्‍प नहीं हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में जाटों के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट किया था। लेकिन इन विधानसभा चुनाव में जाट बिरादरी जाट आरक्षण, नोटबंदी व कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर भाजपा से नाराज नजर आ रहा है। वैसे पहला इतिहास भी देंखे तो जाट बिरादरी अजित सिंह को एक बार सबक देने के बाद फिर से अजित के साथ नजर आती है।

इसी बीच रालोद के महासचिव त्रिलोक त्यागी ने सपा पर बीजेपी के दबाव में आरएलडी के साथ गठबंधन नहीं करने का आरोप लगाया है। उनके मुताबिक बीजेपी ने सपा पर रालोद के साथ गठबंधन नहीं करने का दबाव डाला है।

राजनीतिक और सामाजिक विश्‍लेषक डॉ. मोहम्‍मद अरशद बताते हैं कि पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश में रालोद शुरू से ही ‘मजगर’ के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। जिसका मतलब है मुस्‍लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत। और किसानों पर रालोद की मजबूत पकड़ पुराने समय से ही रही है। लेकिन हालात लगातार बदले है और ऐसे हो गए है कि रालोद गठबंधन भरोसे रहने वाली पार्टी बन गई है।

पश्चिमी यूपी ज्यादातर हिस्सों में पहले और दूसरे चरण में चुनाव होने है। पहले चरण के चुनाव की 73 में से 51 सीट ऐसी हैं जहां जाट वोटर जिस तरफ करवट लेता है वहीं हार-जीत के समीकरण बदलने लगते हैं। ये वोटर उस वक्‍त और ज्‍यादा अहम हो जाता है जब इसके साथ मुस्‍लिम वोटर आ जाता है। खास बात ये है कि 51 में से 25, 30 सीट वो हैं जहां मुस्‍लिम वोटर भी अच्‍छी खासी संख्‍या में है। जानकार बताते हैं कि इन सीटों पर मुस्‍लिम वोटरों की संख्‍या 25 हजार से लेकर 60 हजार तक है। ग्रामीण क्षेत्रों से ज्‍यादा मुस्‍लिम वोटर शहरी सीट पर हैं। यही वजह है कि 2007 के चुनावों पर निगाह डालें तो मेरठ, आगरा और अलीगढ़, मुरादाबाद, की सभी शहर सीट मुस्‍लिम उम्‍मीदवारों के खाते में गई थी।

मौजूदा वक्‍त में रालोद के नौ विधायक इस सीट से हैं। एक विधायक अभी हाल में रालोद छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुका है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से बिखरे जाट-मुस्‍लिम वोट को रालोद ने एकजुट करना भी शुरू कर दिया है। कहा जाता है कि रालोद के लिए भी इस क्षेत्र में ये गठजोड़ संजीवनी है।

चुनाव-दर-चुनाव कम होता गया आरएलडी का जादू

आपको बता दें कि आरएलडी की पकड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अभी निम्न स्तर पर है. 2002 के विधानसभा चुनावों में आरएलडी ने 38 उम्मीदवार उतारे थे जिसमें से 14 को जीत मिली थी जबकि 12 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।

2007 के चुनावों में आरएलडी ने 254 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से उसे सिर्फ 10 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. खास बात यह थी कि 222 सीटों पर आरएलडी के प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई थी. 2007 के चुनावों में आरएलडी का वोट प्रतिशत 3.70% था.

2007 के चुनावों में मिली करारी हार से सीख ले आरएलडी ने 2012 के चुनावों में महज 46 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारे. इस बार भी परिणाम आरएलडी के आशानरुप नहीं रहा और उसे सिर्फ 9 सीटों से संतोष करना पड़ा. चुनावों में उसके 20 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई. 2012 के चुनावों में आरएलडी का वोट प्रतिशत घटकर 2.33% ही रह गया.

2017 के चुनावों के मद्देनजर भी आरएलडी की कोई बड़ी तैयारी नजर नहीं आती. आरएलडी गठबंधन की राह देख रहा है।

सपा को है ध्रुवीकरण का डर

पश्चिमी यूपी में सपा गठबंधन के साथ मैदान में इसलिए उतरना चाह रही है क्योंकि अगस्त 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के बाद राज्य का यह क्षेत्र दो वर्गों में बंटा हुआ नजर आता है. राज्य के इस हिस्से में लोकसभा चुनावों के दौरान ध्रुवीकरण का प्रभाव साफ नजर आया था. हिन्दु बाहुल्य इलाका होने के चलते बीजेपी को थोड़ी राहत की उम्मीद है, यही वजह है कि सपा मुस्लिम वोट पर मजबूत पकड़ बनाने की हरसंभव कोशिश में लगी हुई है.

सपा-बीएसपी में हुई थी कड़ी टक्कर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2012 के आंकड़ों को देखें तो सपा को 24, बीएसपी को 23, बीजेपी को 13, आरएलडी को 9 और कांग्रेस को 5 सीटें मिली थीं. मथुरा की मांट सीट उपचुनाव के दौरान बीजेपी के खाते में आ गई थी. वहीं मथुरा की गोवर्धन सीट से आरएलडी विधायक अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. इसी तरह से अलीगढ़ की बरौली विधानसभा से आरएलडी विधायक भी अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।