झारखंड के गाँवों की महिलाओं का हुनर जा पहुंचा पेरिस

झारखण्ड के छोटे-छोटे गांव की महिलोओं द्वारा बनाए जा रहे कला और हुनर को अब पेरिस में खासा पसंद किया जा रहा है...

झारखंड के गाँवों की महिलाओं का हुनर जा पहुंचा पेरिस

झारखण्ड के हजारीबाग की पुतली गंझू को पढ़ना-लिखना नहीं आता. इन्हें देख कर कोई यकीन भी नहीं कर सकता कि मिट्टी की दीवारों पर उनका हुनर बोलता है और ये हुनर है कोहबर तथा सोहराई.



पुतली अकेली नहीं. रुकमनी, बेला, रूदन, दयामंती, पार्वती समेत गांवों की बहुत सारी महिलाएं हज़ारीबाग के बुज़ुर्ग बुलू इमाम को पापा के नाम से जानती-पुकारती हैं, जो तीन दशकों से ज्यादा वक्त से इस कला को मुकाम देने की कोशिशो में जुटे हैं.

पर्यावरण कार्यकर्ता इमाम, ट्राइबल विमेन आर्टिस्ट कोऑपरेटिव के निदेशक तथा इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज हज़ारीबाग चैप्टर के संयोजक भी हैं. उन्होंने वहाँ एक संग्रहालय भी बनाया है.

हाल ही में पेरिस की एक आर्ट गैलरी में मशहूर फोटोग्राफर डैडी वॉनशावन ने हज़ारीबाग में खींची इन्हीं तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई थी.



बुलू इमाम बताते हैं कि इन कलाओं को कई दफ़ा देश-विदेश के छायाकारों ने कैमरे में कैद किए हैं, सुदूर गांवों की महिलाओं ने महानगरों-विदेशों में हुनर की नुमाइश भी की हैं, पर वॉनशावन ने पहली दफ़ा बिल्कुल अलग और ख़ूबसूरत अंदाज़ में इसे पेश किया है, जिस पर पूरी दुनिया की नज़रें हैं.

बता दें, कोहबर तथा सोहराई झारखंड की जनजातीय कला है, हालांकि दूसरे समुदायों की महिलाएं भी इस हुनर की मुरीद हैं.



सालों पहले इमाम ने इस कला पर पढ़ना-लिखना शुरू किया और साल 1990 में छह महिलाओं को लेकर एक संगठन बनाया फिर कपड़े, कागजों के साथ दीवारों पर उनकी मेहनत को मांजा. और अब वो वक्त आया है जब ढाई से तीन सौ महिलाएं सीधे तौर पर सरकारी-ग़ैर सरकारी स्तरों पर इस काम से जुड़ गई हैं.

वे बताने लगे कि वॉनशावन चार सालों के दौरान चार बार हजारीबाग के दौरे पर आईं. अपने संग्रहालय के पास एक कच्चे घर की दीवारों पर आकृतियां दिखाते हुए कहते हैं पेरिस की प्रदर्शनी में ये भी शामिल है.



ज़ाहिर है इन कलाओं को सहेजने और पेरिस तक पहुंचाने में इमाम के पूरे परिवार ने बड़े जतन किए हैं. उन्हें अफ़सोस है कि झारखंड में कला को लेकर कोई अकादमी नहीं है.



अब मोदी की सराहना के बाद झारखंड की राजधानी रांची में भी सरकार यह काम करवा रही है. इसके ज़रिए ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर मुहैया होने लगे हैं.