SC: जात, मजहब के नाम पर वाेट नहीं मांग सकते

उच्चय न्यालाया ने आज ने हिंदुत्व के मुद्दे पर दायर कई पिटीशन्स पर सुनवाई करते हुए कहा कि धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर नेता वोट नहीं मांग सकते। यह गैर कानूनी है। चुनाव एक सेक्युलर प्रॉसेस है और इसका पालन किया जाना चाहिए।

SC: जात, मजहब के नाम पर वाेट नहीं मांग सकते

उच्चय न्यालाया ने आज ने हिंदुत्व के मुद्दे पर दायर कई पिटीशन्स पर सुनवाई करते हुए कहा कि धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर नेता वोट नहीं मांग सकते। इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम काेर्ट का कहा था की यह गैर कानूनी है आैर चुनाव एक सेक्युलर प्रॉसेस है और इसका पालन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इंसान और भगवान के बीच रिश्ता अपनी निजी पसंद का मामला है। सरकार को इससे खुद को अलग रखना चाहिए। जजाें की बेंच ने की थी सुनवाई।

हिंदुत्व के मसले पर दायर याचिका पर चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अगुआई में जस्टिस एमबी लोकुर, जस्टिस एनएल राव, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एके गोयल और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच सुनवाई कर रही थी। चीफ जस्टिस समेत 4 जजों ने धर्म, भाषा, संप्रदाय और जाति के नाम पर वोट मांगने को करप्ट प्रैक्टिस माना। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर, जस्टिस मदन बी लोकुर, एल नागेश्वर राव और एसए बोबड़े इस फैसले पर राजी थे। जबकि बेंच के 3 जज जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस आदर्श गोयल और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ इसके विरोध में थे।

सात राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर, गुजरात, हिमाचल और गोवा में चुनाव हैं। यहां सीधे तौर पर असर पड़ेगा। किसी भी चुनाव में अब कोई भी राजनीतिक हस्ती, उम्मीदवार, नेता या एजेंट किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय को लेकर लोगों से वोट नहीं मांग पाएगा।

पिटीशन्स में सवाल उठाया गया था कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगना रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट के तहत करप्ट प्रैक्टिस है या नहीं।  इस एक्ट के सेक्शन-123 (3) के तहत 'उसके' धर्म की बात है और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्‍याख्‍या करनी थी कि 'उसके' धर्म का दायरा क्या है। कोर्ट इस बात को देख रहा है कि एक्ट के तहत 'उसके धर्म' (हिज रिलीजन) का मतलब किस तरह से देखा जाए।

चीफ जस्टिस की अगुआई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के दौरान रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट के दायरे को बढ़ाते हुए कहा कि हम ये जानना चाहते हैं कि धर्म के नाम पर वोट मांगने के लिए अपील करने के मामले में किसके धर्म की बात है? कैंडिडेट के धर्म की बात है या एजेंट के धर्म की बात है या फिर तीसरी पार्टी के धर्म की बात है जो वोट मांगता है या फिर वोटर के धर्म की बात है। पहले इस मामले में आए जजमेंट में कहा गया था कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट की धारा-123 (3) के तहत धर्म के मामले में व्याख्या कैंडिडेट के धर्म के रूप में की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच ने एक बार फिर साफ किया कि वह हिंदुत्व के मामले में दिए गए 1995 के फैसले को दोबारा एग्जामिन नहीं करने जा रहे। दिसंबर, 1995 में जस्टिस जेएस वर्मा की बेंच ने फैसला दिया था कि हिंदुत्व शब्द भारतीयों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। हिंदुत्व शब्द को सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। बता दें कि सोशल एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड, रिटायर प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम और दिलीप मंडल ने धर्म और राजनीति को अलग करने के लिए अर्जी दायर की है।