बजट सत्र में सरकार का कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस, मनरेगा में 48,000 करोड़ का प्रस्ताव

साल 2017 के बजट सत्र में मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस किया है। उन्होंने कहा कि एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की ग्रोथ इस साल 4.1 फीसदी रहने का अनुमान है...

बजट सत्र में सरकार का कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस, मनरेगा में 48,000 करोड़ का प्रस्ताव

साल 2017 के बजट सत्र में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस किया है। उन्होंने कहा कि एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की ग्रोथ इस साल 4.1 फीसदी रहने का अनुमान है। नाबार्ड के तहत इरिगेशन फंड को बढ़ाकर 20 हजार करोड़ तक बढ़ा दिया गया। फसलों की बीमा के लिए 9000 करोड़ रुपए का प्रावधान। नाबार्ड के अंतर्गत 8000 करोड़ रुपए का डेयरी प्रोसेसिंग इन्‍फ्रा फंड बनाया जाएगा। एग्री कोऑपरेटिव्‍स के डिजिटाइजेशन के लिए तीन साल में 1900 करोड़ का प्रस्‍ताव है। ई-नैम के तहत हर एपीएमसी के लिए 75 लाख रुपए का प्रावधान किए गए है। मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपए का प्रस्‍ताव है। रूरल प्रोग्राम्स के लिए हर साल 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के खर्च का प्रस्ताव है। 2019 तक 50 हजार ग्राम पंचायतों को गरीबी से मुक्‍त किया जाएगा।

बता दें कि मनरेगा भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया था। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो हर दिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं। 2010-11 वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए केंद्र सरकार का परिव्यय 40,100 करोड़ रुपए था।

गौरतलब है कि मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों। नियत कार्य बल का करीब एक तिहाई महिलाओं से निर्मित है। सरकार एक कॉल सेंटर खोलने की योजना बना रही है, जिसके शुरू होने पर शुल्क मुक्त नंबर 1800-345-22-44 पर संपर्क किया जा सकता है। शुरू में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाता था। लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका पुनः नामकरण किया गया और इसका नाम मनरेगा रखा गया।

इस अधिनियम को वाम दल-समर्थित संप्रग सरकार द्वारा लाया गया था। कई लोगों का मानना है कि इस परियोजना का वादा भारतीय आम चुनाव 2009 में यूपीए के पुनर्विजयी होने के प्रमुख कारणों में से एक था।

वहीं इस योजना को 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 2006-2007 में परिव्यय 110 बीलियन रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 बीलियन रूपए हो गया सबसे पहले पंचायत द्वारा एक प्रस्ताव ब्लॉक कार्यालय में दिया जाता है और फिर ब्लॉक कार्यालय निर्णय लेता है कि काम मंजूर किया जाना चाहिए या नहीं।

मनरेगा, दुनिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी पहलों में से एक है। वित्तीय वर्ष 2006-2007 के लिए राष्ट्रीय बजट 113 बीलियन रुपए था और अब पूरी तरह चालू होकर इसकी लागत 2009-2010 वित्तीय वर्ष में 391 बीलियन रुपये है। ज्यां द्रेज व अन्य लोगों का सुझाव था कि इसका वित्त पोषण उन्नत कर प्रशासन और सुधारों के माध्यम से किया जा सकता है, जबकि अभी तक कर-जीडीपी अनुपात वास्तव में गिरता जा रहा है। ऐसी आशंका है कि इस योजना की लागत जीडीपी का 5% हो जायेगी।

एक अन्य महत्वपूर्ण आलोचना यह है कि सार्वजनिक कार्य योजनाओं का अंतिम उत्पाद असुरक्षित हैं जिन पर समाज के अमीर वर्ग कब्जा कर सकते हैं। मध्य प्रदेश में मनरेगा के एक निगरानी अध्ययन में दिखाया गया कि इस योजन के तहत की जा रही गतिविधियां सभी गावों में कमोबेश मानकीकृत हो गई थी, जिसमें स्थानीय परामर्श नहीं के बराबर था। लेकिन साल 2017 के बजट सत्र के दौरान इसमें काफी बदलाव किए गए हैं।