काम नहीं आएगी मोदी की मेहनत, वेस्ट यूपी में हार जाएगी बीजेपी !

वेस्ट यूपी में बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ सकता है। नाराज जाटों ने बीजेपी से दूरी बनानी शुरु कर दी है।

काम नहीं आएगी मोदी की मेहनत, वेस्ट यूपी में हार जाएगी बीजेपी !

मेरठ की रैली में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये चुनाव स्कैम के खिलाफ है। यहां उन्होंने SCAM का मतलब- S से समाजवादी, C से कांग्रेस, A से अखिलेश और M से मायावती बताया। जब तक उत्तर प्रदेश को SCAM से मुक्त नहीं करोगे तब तक यहां सुख चैन नहीं आएगा। इन्होंने जिनको जमीनों का माफिया कहा ऐसा लोगों को इन्होंने टिकट दिया, क्योंकि इनके इरादे नेक नहीं हैं। पीएम की कोशिश थी की किसी भी तरीके से पश्चिमी यूपी के वोटरों को लुभाया जा सके। लेकिन जमीनी हकिकत ये है कि बीजेपी को जाटों की नाराजगी भारी पड़ सकती है।

2012 में हुए दंगों के बाद से इस क्षेत्र में मुद्दे गौण हो गए हैं, जातियां और धर्म प्रमुख हो गए हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की अपार सफलता के पीछे बड़ा कारण यही था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पहले चरण की 71 सीटों पर फिलहाल तिकोना मुकाबला है।

सपा और कांग्रेस के गठबंधन से सियासी समीकरण एकदम बदल गए हैं। गठबंधन हर जगह लड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि यह इलाका न तो सपा और न ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। त्रिकोण के बाकी दो कोने बसपा और बीजेपी हैं।

अब हालात बदल गए है

गठबंधन होने से पहले तक इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला बीजेपी और बसपा में था। तब तक चुनाव 2014 की तर्ज पर साम्प्रदायिक हो रहा था।  एक संप्रदाय बीजेपी के पक्ष में था तो दूसरा बसपा के। बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार जो उतारे थे। पूरे प्रदेश में 97। उसका मुस्लिम चेहरा नसीमुद्दीन सिद्दीकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी भी थे।

गठबंधन से पहले बीजेपी मान कर चल रही थी कि दलित और मुस्लिम समुदायों के बसपा के पक्ष में जाने से उसे मुश्किल हो सकती है। लेकिन गठबंधन ने उसे राहत दे दी। बीजेपी प्रवक्ता सुदेश वर्मा का कहना था कि अब मुसलमानों के वोट बंट जाएंगे।

लेकिन 2014 के विपरीत इस बार सभी जातियां अलग-अलग जाती दिख रही हैं। जाट राष्ट्रीय लोकदल के साथ, दलित बसपा के तो मुसलमान मुख्य रूप से सपा-कांग्रेस के साथ खड़ा दिख रहा है। सवर्ण जातियां बीजेपी के साथ हैं। जातियों के इस बंटवारे से किसी एक पार्टी के पक्ष में हवा नहीं दिख रही है।

बीजेपी से मुखर हो रहे जाट जा रहे है राष्ट्रीय लोकदल में

पिछले चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की वजह अधिकतर जातियां बीजेपी के साथ थीं। यही वजह है उसने इस इलाके की सभी सीटें जीत ली थीं। लेकिन इस बार जाट बीजेपी से नाराज होकर राष्ट्रीय लोकदल के साथ दिख रहे हैं। जाटों का मानना है कि जाट बाहुल्य हरियाणा में मुख्यमंत्री जाट नहीं बनाया गया। गन्ने के दाम पिछले चार साल से नहीं बढ़ाए गए हैं। हमारा इस्तेमाल खूब किया गया, लेकिन बदले में सिर्फ अपमान मिला।" छपरौली, बड़ौत, कैराना, जानसठ जैसे इलाकों में जाटों की पहचान एक बड़ा मुद्दा है। वे कहते हैं कि उनकी पहचान केवल चौधरी चरण सिंह की वजह से थी।

पिछले चुनाव में अजित सिंह का साथ छोड़ पछता रहें हैं जाट

पिछले चुनाव में चौधरी अजित सिंह का साथ छोड़ने का जाटों को पछतावा भी है। खतौली के रहने वाले कुछ जाटों का कहना है कि रालोद जीते या हारे लेकिन इस बार वोट उसी को देना है। इसी तरह जाटों का गढ़ माने जाने वाली बागपत सीट पर रालोद ने गुज्जर नेता करतार सिंह भड़ाना को टिकट दिया है। उनका मुकाबला बसपा के नवाब अहमद हमीद और बीजेपी के योगेश धामा से है।

अहमद के पिता नवाब कोकब हमीद पांच बार विधायक और तीन बार मंत्री रह चुके हैं। कभी वो अजित सिंह के सबसे करीबियों में शुमार होते थे। लेकिन इस बार पला बदल कर बसपा में आ गए हैं। दलित और मुस्लिम गठजोड़ से उन्हें जीतने की उम्मीद है। वैसे पिछले बार भी ये सीट बसपा की हेमलता चौधरी जीती थीं।

मुसलमान कई भागों में बंटे हैं

पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान बंटा हुआ दिखा। अधिकतर जगहों पर वे सपा उम्मीदवार का साथ दे रहे हैं। बहुतेरे लोगों का कहना है कि, "टीपू हमारा सुलतान है। तरक्कीपसंद है। और उसूल के लिए तो उसने अपने बाप से भी बगावत कर दी लेकिन अपराधियों को पार्टी में नहीं आने दिया।"

इस सबके अलावा हर सीट पर स्थानीय मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा उदाहरण मेरठ की सरधना सीट पर मिला जहाँ 2012 दंगों के आरोपी बीजेपी के संगीत सोम लड़ रहे हैं। बीजेपी के सभी समर्थक उनका मुकाबला बसपा के उम्मीदवार इमरान कुरैशी से बता रहे हैं। इमरान के पिता हाजी याकूब कुरैशी 2007 में बतौर निर्दलीय मेरठ से जीते थे।

पेरिस के अखबार चार्ली हेब्दो के कार्टूनिस्ट द्वारा मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने से नाराज हो याकूब ने उसकी गर्दन काटने वाले को 10 करोड़ रुपए का इनाम घोषित किया था। यानी ध्रुवीकरण के सब कारण यहाँ मौजूद हैं। लेकिन इस सीट पर सबसे मजबूत उम्मीदवार सपा का अतुल प्रधान माने जा रहे हैं।

पश्चिमी यूपी में सपा कांग्रेस के गठबंधन की बात करें तो कांग्रेस उम्मीदवार हर जगह सपा का झंडा लेकर चल रहे हैं। उससे उन्हें फायदा मिल रहा है। लेकिन सपा के लोगों को कांग्रेस का झंडा लगाने में अभी भी संकोच हो रहा है। क्या वे अभी से भविष्य से बारे में सोचने लगे हैं?