तीसरे चरण में है अखिलेश की असली अग्निपरीक्षा !

यूपी में दो चरणों का मतदान हो चुका है अब नजर तीसरे चरण पर है। तीसरे चरण का मतदान अखिलेश की अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

तीसरे चरण में है अखिलेश की असली अग्निपरीक्षा !

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में 19 फरवरी को वोट डाले जाएंगे. इस बार 12 जिलों की 69 सीटों पर मतदान होगा. ये 12 जिले सत्ताधारी समाजवादी पार्टी का गढ़ माने जाते हैं. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यहां क्लीन स्वीप किया था. इस बार भी समाजवादी पार्टी इतिहास दोहराने के लिये पूरी ताकत झोंक रही है. लेकिन बीएसपी और बीजेपी से उसे अपने ही गढ़ में टक्कर मिल सकती है. सपा का किला ढहाने के लिए बीजेपी ने ताबड़तोड़ रैलियां की हैं.

समाजवादी पार्टी के लिए तीसरा चरण बेहद खास है. कई इलाकों से सपा के बागी उम्मीदवार भी मैदान में हैं.

मुलायम परिवार की फैमिली फाइट के बाद इटावा और जसवंतनगर जैसी सीटों पर घमासान तेज है. एक तरफ बीजेपी कोई मौका नहीं गंवाना चाह रही वहीं खुद सपा को भीतरघात का भी डर सता रहा है. अखिलेश ने कई मौजूदा विधायकों का टिकट काट कर नए चेहरों पर भरोसा जताया है. ऐसे में सपा के कई बागी टिकट न मिलने से सपा का समीकरण बिगाड़ने में जुट गए हैं.

तीसरे चरण में 12 जिले की 69 सीटों पर 19 फरवरी को वोट डाले जाने हैं. इसमें फर्रूखाबाद की 4, हरदोई की 8, कन्नौज की 3, मैनपुरी की 4, इटावा की 3, औरैया की 3, कानपुर देहात की 4, कानपुर नगर की 10, उन्नाव की 6, लखनऊ की 9, बाराबंकी की 6 और सीतापुर की 9 सीटें हैं.

यह चरण इसलिए भी अहम है कि क्योंकि इसी दौर के दंगल में चार सीटें ऐसी हैं, जहां सीधे तौर पर सूबे के सबसे ताक़तवर सियासी परिवार यानी यादव फैमिली की साख दांव पर है. यह चार सीटें हैं जसवंतनगर, लखनऊ कैंट, सरोजिनीनगर और रामनगर.

समाजवादी पार्टी में तलवारें खिंचने के बाद फिलहाल तो शीतयुद्ध के हालात हैं, लेकिन चुनाव के बाद क्या तस्वीर उभरेगी इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है. बात उन चार सीटों की जिसमें अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव तीनों की साख दांव पर है. भले ही किसी की सरकार बने, लेकिन इन चार सीटों के नतीजे काफ़ी कुछ बयां करेंगे.

जसवंतनगर- शिवपाल यादव

शिवपाल यादव के लिए यह चुनाव करो या मरो का सवाल है. सपा में हुए विवाद के केंद्र में रहे शिवपाल के लिए जसवंतनगर का चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा है. 1996 से लगातार वे इस सीट से बड़े अंतर से जीतते रहे हैं, लेकिन इस बार अखिलेश समर्थकों की नाराज़गी उनको झेलनी पड़ रही है. 47 साल में केवल दो बार यादव परिवार के हाथ से यह सीट निकली है.

मुलायम सिंह यादव वैसे तो अभी तक केवल दो विधानसभा क्षेत्रों जसवंतनगर और लखनऊ कैंट में प्रचार के लिए गए हैं. लेकिन नेताजी के लिए इस सीट के क्या मायने हैं यह उनकी 11 फरवरी को ताखा में हुई रैली से समझा जा सकता है. जब उन्होंने कहा कि मेरे भाई को किसी तरह जिता देना. अखिलेश को इस रैली में मुलायम ने जिद्दी भी कहा था.

बीजेपी ने उनके ख़िलाफ़ मनीष यादव पतरे को टिकट दिया है, जो पिछला चुनाव बसपा से लड़ चुके हैं. पतरे को पिछले चुनाव में 52 हज़ार जबकि शिवपाल को 1 लाख 21 हज़ार वोट मिले थे. बसपा ने दुर्वेश शाक्य को प्रत्याशी बनाया है. प्रचार अभियान के लिए शायद पहली बार शिवपाल डोर टू डोर कैंपेनिंग कर रहे हैं. यही नहीं इलाके के लोग बताते हैं कि शिवपाल यादव अपना मोबाइल नंबर भी उन्हें यह कहते हुए दे रहे हैं कि कोई भी परेशानी हो तो बताइएगा.

लखनऊ कैंट- अपर्णा यादव

नेताजी की छोटी बहू यानी अपर्णा यादव इस चुनाव से अपनी सियासी पारी का आग़ाज़ कर रही हैं. सपा इस सीट पर कभी जीत नहीं सकी है. ऐसे में यादव परिवार की प्रतिष्ठा यहां भी दांव पर है. इस सीट पर हार-जीत कितनी मायने रखती है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहली बार जेठानी यानी डिंपल यादव भी सार्वजनिक रूप से अपनी देवरानी के समर्थन में निकली हैं. अखिलेश यादव जब पांच कालिदास मार्ग से 4 विक्रमादित्य मार्ग के अपने नए घर में शिफ्ट हुए थे, तो अपर्णा और उनकी सास यानी मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी नहीं पहुंची थीं.

मुलायम सिंह ख़ुद भी अपर्णा के लिए 16 फरवरी को वोट मांगने पहुंचे. लेकिन लखनऊ कैंट की लड़ाई यादव परिवार के लिए इतनी आसान नहीं है. यहां से बीजेपी की प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी से उनकी सीधी टक्कर मानी जा रही है. 40 हज़ार ब्राह्मण और करीब 50 हजार उत्तराखंड के मतदाता होने की वजह से मुकाबला दिलचस्प है.

रीता बहुगुणा ने पिछला चुनाव बतौर कांग्रेस उम्मीदवार जीता था, लेकिन इस बार उनके लिए भी मुकाबला कठिन है. रीता और अपर्णा दोनों उत्तराखंड की बेटी हैं, लिहाजा पहाड़ के मतदाता सोच में हैं कि किसका साथ दिया जाए. बसपा ने भी ब्राह्मण उम्मीदवार योगेश दीक्षित को उतारकर मुकाबले को मुश्किल बना दिया है. मुलायम ने सभा के दौरान खुद कहा था कि यहां उनकी इज़्ज़त दांव पर है. वहीं अपर्णा के पति प्रतीक यादव की पांच करोड़ की कार भी सुर्खियों में रही है. पीएम मोदी ने कन्नौज रैली में कहा था कि समाजवादियों के पास 200 गाड़ियां हैं, जबकि उनके पास एक भी नहीं है.

सरोजिनीनगर- अनुराग यादव

इस सीट से मुलायम सिंह के सांसद भतीजे धर्मेन्द्र यादव के भाई अनुराग यादव सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. लिहाजा सरोजिनीनगर की हार और जीत में यादव परिवार का बहुत कुछ दांव पर लगा है. धर्मेन्द्र यादव ने खुद भी यहां मोर्चा थामा हुआ है. हालांकि सपा को यहां अपनों की बग़ावत के साथ ही बीजेपी की स्वाति सिंह से कड़ी चुनौती मिल रही है.

हाल ही में मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने वाले दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह ने बहस को नया मोड़ दे दिया था. विवाद बढ़ने पर बसपा बैकफुट पर दिखी थी. दयाशंकर को तो बीेजेपी ने छह साल के लिए निकाल दिया, लेकिन स्वाति को पहले यूपी बीजेपी महिला मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया और फिर उन्हें सरोजिनीनगर से टिकट दे दिया गया. अनुराग यादव के लिए पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल भी मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. सपा ने उनका टिकट काट दिया था, जिसके बाद वे बगावत करते हुए राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर मैदान में हैं. वहीं निर्दलीय रुद्रदमन सिंह बीजेपी के संभावित राजपूत वोटों में सेंध लगा रहे हैं.

रामनगर- अरविंद सिंह गोप

बाराबंकी ज़िले की रामगनर एक ऐसी सीट है, जहां यादव परिवार का तो कोई नहीं खड़ा है इसके बावजूद सीधे तौर पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रतिष्ठा दांव पर है. टिकट बंटवारे को लेकर जिन चंद सीटों से सपा के विवाद की शुरुआत हुई थी, उसमें से रामगनगर सीट सबसे ऊपर है. दरअसल दिसंबर महीने में मुलायम सिंह ने शिवपाल की मौजूदगी में 325 उम्मीदवारों की जो लिस्ट जारी की थी, उसमें अखिलेश के कई करीबियों का टिकट कट गया था.

रामनगर सीट से भी अखिलेश के क़रीबी अरविंद सिंह गोप का टिकट काटकर बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र राकेश वर्मा को टिकट दिया गया था. फ़ैसले के लिए आंतरिक सर्वे का हवाला दिया गया था. इसके बाद अखिलेश ने नाराज़गी जताते हुए मुलायम सिंह से पूछा था कि कौन से सर्वे में अरविंद सिंह गोप और पवन पांडे जैसे नेता हार रहे हैं. छात्र राजनीति से सत्ता की सीढ़ी चढ़ने वाले सूबे के ग्राम्य विकास मंत्री अरविंद सिंह गोप लखनऊ यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. इसके अलावा राजनाथ सिंह ने 17 साल पहले सीएम बनने के बाद जब हैदरगढ़ से विधानसभा का चुनाव लड़ा था, तो सपा ने गोप को उतारा था.

अरविंद सिंह गोप के लिए इस बार समीकरण आसान नहीं हैं. रामनगर में कभी कोई प्रत्याशी लगातार दो बार नहीं जीत सका है. वहीं बेटे का टिकट कटने से उन्हें बेनी बाबू की नाराज़गी का नुकसान झेलना तय माना जा रहा है. अच्छे-ख़ासे कुर्मी वोट वाली सीट पर पिछड़े वर्ग के बड़े नेता बेनी प्रसाद वर्मा का काफ़ी असर रहा है. ऐसे में उन्हें यह तिलिस्म भी तोड़ना पड़ेगा. बसपा ने उनके ख़िलाफ़ हफ़ीज़ भारती और बीजेपी ने शरद अवस्थी को उतारा है. वहीं पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा के पीस पार्टी से उतरने के बाद सपा को मिलने वाला संभावित कुर्मी वोट कई तरफ़ बिखर सकता है।